*पुनर्जन्म की गुत्थी !*

 
Punarjanm ka sach !

पुनर्जन्म की गुत्थी ! 

  सृष्टि रचना के सन्दर्भ में इस सँसार में मुख्यतः दो प्रकार की धारणायें प्रचलित हैं। 

 प्रथम, यह सृष्टि 'आदम और हव्वा' के संयोग से बनी है।

  द्वितीय, यह सृष्टि 'मनु और शतरूपा' के संयोग से बनी है।

  प्रथम धारणा तो पश्चिमी देशों, विशेषकर पश्चिम एशिया (यहुदी देश) की है। इस धारणा में पुनर्जन्म के सन्दर्भ में कोई टीका-टिप्पणी नहीं की गई है। 

  द्वितीय धारणा तो पूर्वी देशों की है, विशेषकर भारतीय संस्कृति की। इस धारणा में पुनर्जन्म के सन्दर्भ में सविस्तार व्याख्याएं की गईं हैं। यहाँ तक की पुनर्जन्म की कहानियां भी यहाँ की भूमि में प्रचलित हैं।

  Contents :-

1.पुनर्जन्म के संदर्भ में पश्चिमी धारणा !

2. पुनर्जन्म के संदर्भ में पूर्वी धारणा !

*पुनर्जन्म के संदर्भ में पश्चिमी धारणा!

   सृष्टि रचना और पुनर्जन्म के सन्दर्भ में जो यह प्रथम धारणा है यह मूल रूप से यहुदी विचारधारा है जिसे प्रत्यक्षत: इसाईयों और मुसलमानों ने ग्रहण किया है। यहुदी विचारधारा की पैदाइश मूल रूप से ऐबेर तथा अब्राहिम से हुई मानी जाती है। इसीलिये इसाई धर्म और मुस्लिम धर्म दोनों ही इब्राहिमिक धर्म कहलाते हैं। इन धर्मों में पुनर्जन्म के सन्दर्भ में कहीं कुछ भी नहीं लिखा गया है। केवल यही कहा गया है कि 'एक ही जन्म है और एक ही बार मारना है, उसके बाद आत्माओं के जीवन और मृत्यु (स्वर्ग और नरक) का फैंसला किया जायेगा। परन्तु कहीं-कहीं पुनर्जन्म की धारणा के वजूद के होने का जिक्र भी मिलता है। जैसे, बाईबल के नया नियम के यूहन्ना रचित सुसमाचार में - ('हे प्रभु, किसने पाप किया कि यह अन्धा जन्मा है, क्या इसने स्वयं या इसके माता पिता ने ?') अध्याय 9:1-3.

   तो इससे तो यही लगता है की उक्त काल में यहुदी समाज का कुछ तबका पुनर्जन्म की धारणा को अवश्य ही मानता था। परन्तु एक बात उपर्युक्त पंक्ति में ध्यान देने योग्य यह है कि येशु ने पुनर्जन्म की बात को सीरे से खारिज नहीँ किया, परन्तु उन्होने तो केवल पुनरुत्थान की ओर मनुष्य का ध्यान केंद्रित किया था।

  यहुदी विचारधारा के अनुसार मनुष्य हो या अन्य प्राणी सभी का विकास या विस्तार केवल प्रजनन करके ही होता है। एक प्राणी या एक मनुष्य के द्वारा ही दूसरा प्राणी या दूसरा मनुष्य उत्त्पन्न होता है। दूसरा प्राणी या दूसरा मनुष्य उस पहले प्राणी या उस पहले मनुष्य का ही स्वरूप होता है।

  मनुष्य के मामले में मूल रूप से मनुष्य एक अच्छा तथा पवित्र प्राणी है जो कि उसके आत्मिक पिता *परमेश्वर का स्वरूप है। परन्तु उसके जीवन में पाप के आ जाने से अब प्रत्येक मनुष्य जो जन्म लेता है वो पूर्णतः पवित्र नहीं होता वरन पापी ही होता है, क्योंकि पाप की यह बिमारी आदिकाल से उसके लहु ही में से होकर बढ़ रही है पीढी-दर-पीढ़ी।

  यहुदी विचारधारा के अनुसार प्रत्येक वो मनुष्य जो पाप में गिरा है मरने के बाद अधोलोक में जाता है जहाँ उसे अन्तिम न्याय के होने तक रहना पड़ता है। परन्तु जो मनुष्य अपने अच्छे कर्मों व विश्वास से जीवन जीता है वो मरने के बाद उस स्वर्ग में जहाँ अब्राहिम रहता है जाता है और वहाँ जीवित ही रहता है अंतिम न्याय तक।

  यहुदी विचारधारा में मनुष्य सृष्टि की संरचना काफी हद तक वैज्ञानिक प्रतिभास होती है।  पापों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलना भी मानों किसी भयंकर बिमारी (केन्सर, एड्स या वायरस डीजिज) की भाँति ही लगता है।  

  परन्तु यदि हम यहुदी विचारधारा का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तथा उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो भी इसकी वैज्ञानिक्ता पर संदेह होने लगता है। जैसे, आदिकाल से मनुष्य, हर मनुष्य पापी है, जो कि उसके खून में ही है और यह एक आत्मिक (प्राणिक) बिमारी है, उसका स्वभाव नहीं। इसलिये मनुष्य के पास चुनाव है कि वह बिमार होकर जीना चाहता है या फिर अपने मूल स्वभाव के अनुसार जीना चाहता है। इसलिये इस  जीवन में बहुत से मनुष्य बिमारी के वश में होकर जीवन जीते हैं तो कुछ अपनी बिमारी को भूल कर या उसे अपने पावों तले रोन्ध कर अपने मूल स्वभाव के अनुसार जीवन जीते हैं। अत: संपूर्ण मानवता का जीवन एक मिलीजुली कथायें हैं। अब इन कथाओं में किसी के हिस्से में सुख आता है तो किसी के हिस्से में दुख। किसी मनुष्य के हिस्से में उसके अपने आत्मोत्थान के लिये अवसर आते हैं तो किसी को कोई अवसर ही नहीं मिलता। अकसर यही देखा गया है की भला मनुष्य दीन-दरिद्र और दुखी ही पाया जाता है और दुष्ट मनुष्य सम्मानित, संपन्न और सुखी। इसलिये यदि मनुष्य का एक ही जन्म होता है और एक ही मृत्यु होती है तो फिर मनुष्य की कहानी में यह असमान न्याय क्यों ?  जो मनुष्य आम का वृक्ष बोता है फिर उसे बबूल का पेड़ फल के रूप में क्यों मिलता है ? माना की सभी पापी ही हैं, तो भी उनमें से कई पापी इतने सुखी क्यों हैं ? 

  अब इस प्रश्न के उत्तर में 'प्रभु की इच्छा' कहना अपने आप को दिलासा देना मात्र है, और अन्तिम न्यायकाल के बाद अच्छे लोगों को उनके अच्छे फल मिलेंगें यह कहना भी अपने आप को दिलासा देना ही है। 

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    *पुनर्जन्म के संदर्भ में पूर्वी धारणा !

  पूर्वी विचारधारा के अनुसार  मनु और शतरूपा के संयोग से मनुष्य सृष्टि का विकास हुआ है। इस विचारधारा के अनुसार पाप कहीं से आया नहीं या पाप का बीज शैतान ने बोया नहीं। पाप जैसी कोई चीज होती नहीं। पाप तो मात्र अज्ञानता का दूसरा नाम है।  और पीडाओं का मूल कारण अज्ञानता ही है अर्थात इस सृष्टि अथवा प्रकृति के त्रिगुणों (सत-रज-तम) के स्वभाव को न समझ पाना ही अज्ञानता है और इसी अज्ञानता में चिपके रहना ही पाप है। 

  सतयुग में सभी मनुष्य जो मनु की संतानें थीं, कोई भी अज्ञानी नहीं थे, सभी के सभी ज्ञानी थे इसीलिये दुख-पीड़ा और तकलीफें नहीं थी। परन्तु जैसे जैसे समय गुजरा और त्रेतायुग आया, मनुष्य त्रिगुणों के जाल में फँसने लगे और यहीं से अज्ञानता तथा पाप की पैदाइश हुई।

  पूर्वी विचारधारा के अनुसार, पाप पर अथवा अज्ञानता पर जय पाना कठिन नहीं होता। क्षण भर में मनुष्य इस पर जय पा सकता है। इसके लिये मनुष्य को अपने उसी सतयुगी स्वभाव को पहचानना पड़ता है, आत्मज्ञान को धारण करना पड़ता है।

  अब पूर्वी विचारधारा पर संदेह यह है कि यदि सतयुग में सभी के सभी मनुष्य पवित्र, निर्मल व आत्मज्ञानी थे तो फिर क्योंकर उनका पतन हुआ। कैसे अचानक उनमें बदलाव आना शुरु हुआ?

  यदि सतयुग में सभी आत्मिक थे तो आगे चल कर उनकी संताने भ्रष्ट व पापी कैसे हुईं ? तो ये भ्रष्ट व पापी संताने उनके स्वयं के पूर्व जन्म में क्या थीं, जबकि उनसे ठीक पहले तो सभी धर्मात्मायें थें ?  तो ये पापी आत्माएं कहाँ से आईं ? क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य पुनर्जन्म लेता है। पुर्वजन्म के संस्कारों को लेकर वो पुन: जन्म लेता है। तो फिर क्या सतयुग के मनुष्यों को मुक्ति नहीं मिली थी ? यदि नहीं मिली थी तो फिर त्रेतायुग में उनके पुनर्जन्म होकर वे भी भले मनुष्य ही होते। परन्तु नहीं, यहाँ तो हम उल्टा ही देखते हैं कि त्रेतायुग में लोग भ्रष्ट व पापी होने लगे। तो ये कौन सी आत्माएं थीं? या फिर ये त्रेतायुग में भ्रष्ट कैसे हुईं ?

  सतयुग में लोगों की कितनी जनसंख्या थी ? पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार त्रेतायुग में भी इतने ही लोगों को पुन: जन्म लेना चाहिये था। मगर नहीं, यहाँ तो त्रेता, द्वापर और कलयुग में लोगों की जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धी ही देखने को मिलती है। 

  तो क्या ये सभी आत्माएं जो जन्म लेने इस पृथ्वी पर आती हैं वे क्या किसी दूसरे लोक से आती हैं ? तो फिर ऐसा क्या संभव है कि उस लोक का कर्म फल वे इस लोक (पृथ्वी) में भुगतें ? 

  संक्षेप में, हम यही आंकलन लगा सकते हैं कि यह पृथ्वी एक कर्मलोक है तथा कर्मफल भोग लोक भी है। 

   अत: या तो इब्रानी विचारधारा के अनुसार ही मनुष्य का विकास होता रहता है, कोई पुनर्जन्म नहीं होता है, पर हाँ, आत्मिक जीवन फिलहाल मृत्यु के बाद प्रत्यक्ष होता है एक दूसरे आयाम में; या फिर पृथ्वीलोक में अन्य लोकों से आत्माएं केवल मुक्ति पाने के मकसद से मनुष्य योनि में जन्म लेती रहती हैं एक मनुष्य के रूप में। और यह सिलसिला सृष्टि के आदि से चला आ रहा है शायद सृष्टि के अन्त तक के लिये !

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