*क्या हिन्दुराष्ट्रवाद की स्थापना की जा रही है ?*

 

हिंदुराष्ट्रवाद का इतिहास !

क्या हिन्दुराष्ट्रवाद की स्थापना की जा रही है ?

सभी जानते हैं कि तथाकथित हिन्दू आर्य लोगों की हस्ती सिंधुघाटी की सभ्यता से पहले इस भारत भूमी पर नही थी। हिन्दु-राष्ट्रवाद का इतिहास में हिन्दुराष्ट्रवाद की शुरुवात संभवत: सप्तसिंधु प्रदेश की सभ्यता के जमाने से ही हो चुकी थी, जो वक्त के साथ आगे चलकर स्थिर न हो सकी। क्योंकि वक्त-वक्त में यहाँ की भूमी में कई और विदेशी आक्रान्ता आते रहे, जिन्होने अपने-अपने समयों में अपने-साम्राज्यों की नींव डाली। लेकिन हमारे भारतीय इतिहास में एक वक्त ऐसा भी आया जब फिर से दूसरी बार हिन्दु राष्ट्रवाद की नींव डाली गई, जिसके पुख्ता सबूत हमारे इतिहास के लेखों, अभिलेखों और समारकों में दर्ज हैं जिसकी पुष्टि उक्त काल के विदेशी लेखक ने भी अपनी पुस्तक में की है।

इतिहास में गुप्त साम्राज्य हिन्दु-राष्ट्रवाद की स्थापना करता है!


  भारतीय राष्ट्रवाद बनाम हिन्दु-राष्ट्रवाद की इस श्रृंखला में इतिहास में गुप्त साम्राज्य का प्रथम शासक चंद्रगुप्त प्रथम था। यह सम्राट न होकर एक राजा था। लेकिन इसी के प्रयासों के कारण गुप्तवंश ने भारत में हिन्दुराष्ट्र की नींव रखी। यह पाटलिपुत्र का एक छोटा-सा राजा था। इसके समय तक सम्राट अशोक के वंश का नाम मिट चुका था। यह समय ईसा के बाद चौथी सदी की शुरुआत में, यानी 308 ईसवी की है और सम्राट अशोक की मृत्यु के 536 वर्ष बाद की बात है।

  हिन्दुराष्ट्रवाद का इतिहास देखें - चंद्रगुप्त एक महत्वाकांक्षी और सुयोग्य व्यक्ति था। वह उत्तर के दूसरे आर्य राजाओं को अपनी तरफ मिलाने में और उन सबका एक संघ कायम करने में लग गया। सबसे पहले उसने मशहूर लिच्छवी वंश की कन्या कुमारदेवी से विवाह किया, और इस प्रकार इस जाति की सहायता हांसिल कर ली। इस तरह होशियारी के साथ जमीन तैयार कर लेने के बाद चंद्रगुप्त ने भारत के सारे विदेशी शासकों के खिलाफ धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी। 

 क्षत्रिय और आर्यजाति के ऊंचे-जाति के ऊंचे वर्ग के लोग, जिनके अधिकार और पद विदेशियों ने छीन लिये थे, इस लड़ाई के समर्थक थे। बारहवर्ष की लड़ाई के बाद चंद्रगुप्त उत्तर भारत के कुछ हिस्से पर कब्जा करने में कामयाब हुआ, जिसमें वह हिस्सा भी शामिल था, जो आजकल उत्तरप्रदेश कहलाता है। इसके बाद वह राजराजेश्वर की पदवी धारण करके सिंहासन पर बैठ गया। इस तरह गुप्त राजवंश की शुरुआत हुई। 

 यह वंश करीब दो सौ वर्षों तक चलता रहा, जबतक हूणों ने आकर इसे परेशान करना शुरु न किया ! कुछ हद तक यह जमाना जबरदस्त हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का था। तुर्की, पार्थव वगैरा अनार्य विदेशी शासक जड़ से उखाड़ फेंके गये और जबर्दस्ती निकाल बाहर किये गये। इस प्रकार इस जमाने में हम जातिय विद्वेष की भावना को काम करते देखते हैं।

 उच्चवर्ग के भारतीय आर्य लोग अपनी कौम पर अभिमान करते थे और इन बर्बरों और म्लेच्छों को नफ़रत की निगाह से देखते थे। गुप्तों ने जिन भारतीय आर्य राज्यों को और राजाओं को जीता, उनके साथ नरमी का बर्ताव किया; लेकिन अनार्यों के साथ कोई रिआयत नहीं की गई।

समुंद्रगुप्त ने गुप्तराज्य को साम्राज्य में तबदील किया!

  चंद्रगुप्त का पुत्र समुंद्रगुप्त अपने पिता से भी ज्यादा जबर्दस्त लड़ाका था। वह बहुत बड़ा सेनापति था, और जब वह सम्राट हुआ तो उसने सारे देश में यहाँतक कि दक्षिण में भी, सबको जीतकर अपनी विजय-पताका फहराई। इसने गुप्तराज्य को इतना बढ़ाया कि वह साम्राज्य में तबदील हो गया। इसका साम्राज्य भारत के बहुत बड़े हिस्से में फेल गया था, पर दक्षिण में इसका साम्राज्य नामात्र का था। इसी समुंद्रगुप्त को आधुनिक इतिहासकारों ने 'भारतीय नेपोलियन' कहा है !

 चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने हिन्दुराष्ट्रवाद की स्थापना की!

हिंदुराष्ट्रवाद का इतिहास !

 समुंद्रगुप्त का पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय भी एक योद्धा राजा था। इसने शक या तुर्की राजवंश भारत भूमी से समूल रूप से खदेड़ कर सम्राट विक्रमादित्य की उपाधि हांसिल की। ठीक रोमी 'सीजर' की उपाधि की तरह। 

 दिल्ली में कुतुबमीनार के पास जो महरौली का लोह-स्तंभ लेख है वह इसी विक्रमादित्य ने एक विजय-स्तंभ के रूप में बनवाई थी।  इसकी चोटी पर कमल का फूल है, जो गुप्त साम्राज्य का चिन्ह था।

 खासकरके चंद्रगुप्तविक्रमादित्य का काल भारत में हिन्दु-राष्ट्रवाद  का जमाना था। इस काल में पुरानी आर्य-संस्कृति और संस्कृत विद्या का खूब पुनरुत्थान हुआ। यूनानी और मंगोलियान संस्कारों को, जो भारतीय जीवन और संस्कृति में यूनानियों, कुषाणों वगैरा के जरिये आ गये थे, प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था। जबकि आर्यपरंपराओं पर जोर दे कर इन्हें नीचे गिराया जाता था।

  संस्कृत राजभाषा थी; लेकिन उन दिनों भी वह जनता की आम बोलचाल की भाषा नहीं थी, बल्कि प्राकृत भाषा बोली जाती थी जो संस्कृत से मिलती जुलती भाषा थी। फिर भी संस्कृत भाषा काफी प्रचलित थी। इस काल में संस्कृत कविता, नाटक और भारतीय आर्य कलाएँ खूब खिलीं। जिस महान युग में वेद और महाकाव्य लिखे गये, उसके बाद, संस्कृत साहित्य के इतिहास में, शायद इसी जमाने में सबसे ज्यादा और सबसे सुन्दर साहित्य लिखा गया।

 संस्कृत का अद्भुत कवि कालिदास इसी जमाने में हुआ। सम्राट विक्रमादित्य का दरबार बड़ी चमक-दमक वाला था। जिसमें उसने उस समय के सबसे श्रेष्ठ कवि, लेखकों और कलाकारों को जमा किया था जिन्हें उसके दरबार के नवरत्न कहा जाता था। इसी सम्राट के आदर्श की नकल कर भविष्य में मुगल सम्राट अकबर ने भी ठीक ऐसा ही दरबार बनाया था जिसमें उसने भी नवरत्नों को रखा था।

  इसी युग में साहित्यों में काफी फेर-बदल भी हुआ था। वेदों की टीका-टिप्पणी की गई। मुख्य अठारह पुराण 108 पुराणों में तबदील हुये। सृष्टि उत्त्पति और जलप्रलय जैसी घटना को जो कि बाहर की संस्कृतियों से सुनी गई थीं, तोड़-मरोड़ के अपनी आर्यसंस्कृति के हिसाब से लिखी गईं। इसी युग में जातिप्रथा को बहुत अधिक बढ़ावा मिला। बौद्ध राज्यों और साम्राज्य का समूल नाश कर दिया गया। प्रत्यक्ष रूप में बौद्ध धर्म पर कोई अत्याचार नहीं किया गया, परन्तु चतुर ब्राह्मणों ने बौद्धधर्म को हिन्दु धर्म में (ब्राह्मण धर्म में) आत्मसात कर लिया। इन्होने वो तरीका इजात किया जिससे बौद्धधर्म की हस्ती ही भारत भूमी से लगभग मिट ही गई। मगर शुक्र है दक्षिण भारत के बौद्ध राजाओं का, जिन्होने समय रहते बौद्धधर्म का प्रचार विदेशों में कर दिया, वरना आज बौद्ध धर्म का नामो-निशान तक न होता।

केंद्र में वर्तमान सरकार हिन्दु-राष्ट्रवाद की पुन: स्थापना का प्रयास कर रही है !

 हाँ, यह सौफीसदी सच है कि हमारे भारत की वर्तमान केंद्रीय सरकार हिन्दु-राष्ट्रवाद की इस श्रृंखला में हमारे भारत भूमी में इतिहास को पुन: दोहरा रही है। वह इतिहास से अब तीसरी बार भारत को हिन्दु-राष्ट्रवाद में तबदील करने का प्रयास कर रही है। हिन्दुराष्ट्रवाद का इतिहास  फिर से दोहराया जा रहा है. उसकी नीति पूरी तरह हिन्दु-राष्ट्रवादी है। इस सरकार का भरपूर प्रयास है कि इस भूमी में से अन्य विदेशी धर्मों को पूरी तरह जड़ से उखाड़ फैंके। जो कोई भी विदेशी धर्मो को मानते आये हैं या मानते हैं उन्हें किसी न किसी तरीके से हिन्दु धर्म को मानने में बाध्य किया जाये। सड़कों, चौराहों, स्मारकों, जगहों का नाम बदल कर हिन्दु नाम का किया जा रहा है - इतिहास के प्रमाण दे दे कर। संविधान में ऐसे-ऐसे संशोधन किये जा रहे हैं जिससे सीधे-सीधे हिन्दु राष्ट्रवाद के लिये रास्ते खुलते हैं।

 अब यह सब कहाँ तक सही है इस बात पर हमें विचार करना होगा ! क्योंकि इतिहास में बौद्धकाल में भी विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहा करते थे, लेकिन कभी भी बौद्ध राजाओं और सम्राटों ने तलवार या शक्ति के दम पर सभी प्रजा को बौद्ध अनुयायी या संस्कृति का मानने वाला नहीं बनाया। उन्होने प्रजा को प्यार और मानवता पूर्ण आदर्शों से जीतने का प्रयास किया। उक्त काल में बौद्धों की शासन सत्ता अधिकतर लोकतांत्रिक था, परन्तु राजतंत्र होने पर भी उन्होंने प्रजा के साथ धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य जैसा व्यवहार किया था। तो क्या ये आदर्श आज भी व्यवहार में लाये जा रहे हैं या फिर ये इतिहास के गहरे सागर में सदा-सदा के लिये विलीन हो गये हैं ?

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