*कहानी इस्लाम की ! (आइये जाने इस्लाम के बारे में एक अलग अंदाज में!)*

 

 कहानी इस्लाम की ! (आइये जाने इस्लाम के बारे में एक अलग अंदाज में!)

 इस्लाम के जनक अरबी लोग :- अरब एक रेगिस्तानी मुल्क है, और रेगिस्तानों और पहाड़ों में पलनेवाले लोग मजबूत होते हैं, जिन्हें अपनी आजादी प्यारी होती है और जिन्हें आसानी से दबाया नहीं जा सकता। फिर अरब कोई उपजाऊ देश नहीं था, और इसमें कोई ऐसी चीज भी नहीं थी, जो विदेशी विजेताओं या साम्राज्यवादियों को खींचती। इसमें बस सिर्फ दो छोट-छोटे नगर थे, मक्का और यथरीब, जो समुद्र के किनारे बसे हुये थे। बाकी रेगिस्तान के भीतर सिर्फ वास-स्थान थे और इस देश के लोग ज्यादातर बददु, 'रेगिस्तान के बाशिंदे' थे। तेज ऊंट और खूबसूरत घोड़े इनके आठों पहर के साथी थे और अद्भुत सहनशीलतावाला गधा भी एक कीमती चीज और वफादार दोस्त समझा जाता था। किसी को गधे की उपमा देना उसकी तारीफ समझी जाती थी; दूसरे देशों की तरह कोई गाली नहीं। क्योंकि किसी रेगिस्तानी मुल्क में जिंदगी बड़ी सख्त होती है और दूसरी जगहों की बनिस्बत वहां मजबूती और सहन-शक्ती कहीं ज्यादा कीमती गुण समझे जाते हैं।

   अरबी लोगों का स्वभाव

  रेगिस्तान के ये बाशिंदे आत्मस्वाभिमानी, भावुक और झगड़ालू होते थे। ये अपने-अपने वंशों और खानदानों में रहते थे, और दूसरे वंशों और खानदानों से झगड़ा करते थे। साल में एक बार ये लोग आपस में सुलह कर लेते थे और जियारत के लिये मक्का जाया करते थे, जहां इनके देवताओं की बहुत-सी मूर्तियाँ रहती थीं। सबसे ज्यादा वे एक बड़े भारी काले पत्थर (संगे अस्वद) की पूजा करते थे, जिसका नाम 'काबा' था।

 अरबी लोग घुमक्कड़ कबीलाई थे

 इन लोगों की जिंदगी घुमक्कडों की जिंड़गी थी, जिसमें हर खानदान का सब्से बूढ़ा आदमी सरदार होता था। इनकी जिंदगी उसी किस्म की थी, जैसी कि शहरी जीवन और सभ्यता अपनाने के पहले मध्य-एशिया या दूसरी जगहों के आदिम कबीले बसर किया करते थे। अरब के चारों तरफ जितने बड़े-बड़े साम्राज्य बने, उन सबकी सल्तनत में अक्सर अरब देश भी शामिल होता था। लेकिन यह अधीनता असली न होकर सिर्फ नाम के लिये होती थी। क्योंकि घुमक्कड़ रेगिस्तानी कबीलों को दबाकर रखना या उनपर हुकूमत करना कोई आसान बात नहीं थी।

 अरब की एक छोटी-सी सल्तनत

 एक बार सीरिया में पालमीरा में एक छोटी-सी अरब सल्तनत कायम हूई थी, और ईसवी सन की तीसरी सदी में, थोड़े दिनों के लिये इसका एक शानदार जमाना रहा था। लेकिन यह भी मुख्य अरब के बाहर थी। मतलब यह कि बददु लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी रेगिस्तानी  जिन्दगी बिताते रहते थे, अरबी जहाज व्यापार के लिये बाहर जाते थे, और देश का जीवन बिना किसी परिवर्तन के चलता रहता था। कुछ लोग ईसाई हो गये थे, और कुछ यहुदी; लेकिन ज्यादातर लोग 360 मूर्तियों के, और मक्का के संगे-असवद के पूजनेवाले ही बने रहे। 

 इस्लाम ने सिमटे हुये अरबों को जगाया

 अरब लोग जो युगों से सोते हुओं की तरह जीवन बिता रहे थे और जाहिर तौर पर दूसरी जगहों की घटनाओं से बिलकुल अलग थे, अचानक जाग पड़े, और उनने इतनी जबर्दस्त जीवट दिखाई कि सारी दुनिया को चौंका दिया और उसमें उथल-पुथल मचा दी। अरब लोग एशिया, यूरोप और अफ्रीका में बड़ी तेजी के साथ फेल गये, और उन्होने ऊंचे दर्जे की संस्कृति और सभ्यता का किस तरह विकास किया, यह इतिहास में एक चमत्कार की बात है।

 जिस नये बल या भावना ने अरबों को जगाया और उनमें आत्म-विश्वास और जोश भर दिया, वह इस्लाम था। इस मजहब को एक नये पैगंबर, मोहम्मद ने, जो मक्का में 570 ईसवी में पैदा हुये थे, चलाया था। उन्हें इस मजहब को शुरु करने की कोई जल्दी नहीं थी। वह शान्ति की जिंदगी गुजारते थे, और मक्का के लोग उनको चाहते थे और उनपर भरोसा करते थे। वास्तव में लोग उन्हें 'अल-अमीन' या अमानतदार कहा करते थे। लेकिन जब उन्होने अपने नये मजहब का प्रचार शुरु किया, और खासकरके जब मक्का की मूर्तियों की पूजा का विरोध किया तो उनके खिलाफ बड़ा हल्ला मचा और आखिर उनको अपनी जान बचाकर मक्का से भागना पड़ा। सबसे ज्यादा वह इस दावे पर जोर देते थे, कि खुदा सिर्फ एक है, और वह, मुहम्मद, उसका रसूल है।

  मुहम्मद का संघर्ष

 जब मक्का से अपने ही लोगों ने उन्हें भगा दिया, तो उन्होने यथरीब में अपने कुछ दोस्तों और मददगारों के यहां पनाह ली। मक्का से उनके इस कूच को अरबी जबान में 'हिजरत' कहते हैं, और मुसलमानी सन उसी वक्त से यानी 622 ईसवी से शुरु होता है। यह हिजरी सन चांद्र है, यानी इसमें चंद्रमा के अनुसार तारीखों का हिसाब लगाया जाता है। इसलिये सौर-वर्ष से, जिस्का आजकल आम-तौर पर प्रचार है, हिजरी साल 5-6 दिन कम का होता है। हिजरी सन के महीने हर साल एक ही मौसम में नहीं पड़ते। हिजरी सन का एक महीना अगर इस साल जाड़े में है तो कुछ वर्षों के बाद वही महीना बीच गर्मी में पड़ सकता है।

 ऐसा कहते हैं कि इस्लाम, हिजरत से, यानी 622 ईसवी से शुरु हुआ, हालाँकि एक लिहाज से वह इसके कुछ पहले ही शुरु हो चुका था। यथरीब शहर ने मोहम्मद का स्वागत किया और उनके आने की ताजीम में इस शहर का नाम बदलकर 'मदीनत-उन-नबी' यानी 'नबी का शहर' कर दिया। आजकल संक्षेप में इसे सिर्फ मदीना कहते हैं। मदीना के जिन लोगों ने मोहम्मद की मदद की थी वे 'अंसारी' यानी मददगार कहलाए। इन अंसारों के वंशज अप्ने इस खिताव पर अभिमान करते थे और अभी तक इसका इस्तेमाल करते हैं। 

 मोहम्मद का इस्लामिक मिशन

 इस्लाम के उदय के समय एशियाई और यूरोपीय दुनिया की यह हालत थी - चीन शक्तिशाली और मजबूत था, लेकिन वह बहुत दूर था। भारत भी कम-से-कम कुछ दिनों तक तो काफी मजबूत था। उस समय भारत के साथ इस्लाम का बहुत दिनों तक कोई संघर्ष भी नहीं हुआ था। यूरोप और अफृका कमजोर और पस्त हो चुके थे।

 हिजरत के सात वर्ष के अंदर ही मोहम्मद मक्का के स्वामी बनकर ही वहाँ लौटे। इसके पहले ही वह मदीना से दुनिया के बादशाहों और शासकों के पास परवाना भेज चुके थे कि वे एक अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लायें। कुस्तुन्तुनिया के सम्राट हीरेक्ली के पास यह परवाना उस वक्त पहुंचा था, जब वह सीरिया में ईरानियों के खिलाफ लड़ाई में मशगूल था। ईरान के बादशाह के पास, और कहते हैं कि चीन के ताई-त्सुंग तक भी यह परवाना पहुँचा था। इन बादशाहों और शासकों को बड़ा ताज्जुब हुआ होगा कि आखिर यह अनजान आदमी कौन है जो उनके ऊपर हुक्म चलाने की जुर्र्त करता है ! इन पैगामों के भेजने से ही हम कुछ अंदाजा लगा सकते हैं कि मोहम्मद को अपने में और अपने मिशन में कितना बड़ा भरोसा था। यही भरोसा और ऐतकाद उसने अपनी कौम में भर दिया, और इसी से प्रेरणा और तसल्ली हासिल करके रेगिस्तान के ये लोग जिनकी पहले कोई बड़ी हैसियत नहीं थी, उस समय तक मालूम दुनिया के आधे हिस्से को जीतने में सफल हुये।

 इस्लाम ने सबसे पहले शान्ति और भाईचारे का संदेश दिया

भरोसा और ऐतकाद खुद तो बड़ी चीजें थीं ही। साथ ही इस्लाम ने शान्ति और भाईचारे का, यानी सब मुसलमान बराबर हैं, इस बात का भी संदेश दिया। इस तरह कुछ हद तक लोकतंत्र लोगों के सामने आया। उस जमाने की भ्रष्ट ईसाइयत के मुकाबले में भाईचारे के इस संदेश ने सिर्फ अरबों पर ही नहीं, बल्कि जहाँ-जहाँ वे गये, उन सभी के निवासियों पर भी, बड़ा भारी असर डाला होगा।

 मोहम्मद की मृत्यु और उनके बाद

 मोहम्मद 632 ईसवी में, हिजरत के दस साल बाद मरे। उन्होने अरब के आपस में लड़नेवाले कई कबीलों को संगठित करके एक राष्ट्र बनाया और उनमें एक उद्देश्य के लिये जबर्दस्त जोश भर दिया। इसके बाद इनके खानदान के एक व्यक्ति अबूबकर खलीफा हुये। खलीफा चुनने का यह काम आम सभा में गैर-रस्मी चुनाव से होता था। दो साल बाद अबूबकर मर गये, और उमर उनकी जगह खलीफा बनाये गये। यह दस साल तक खलीफा रहे।

  अबूबकर और उमर

 अबूबकर और उमर महान व्यक्ति थे, जिन्होने अरबी और इस्लामी महानता की बुनियाद डाली। खलीफा की हैसियत से वे धर्माध्यक्ष और राजनीतिक सरदार, यानी बादशाह और पोप दोनों थे। अपने ऊंचे ओह और राज्य की बड़ती हुई शक्ती के बावजूद उन्होने अपने रहन-सहन की सादगी नहीं छोड़ी, और ऐश-आराम व ऊपरी शान-शौकत से कतई इंकार कर दिया। इस्लाम का लोकतन्त्र इनके लिये एक जिंदा चीज थी। लेकिन इनके मातहती हाकिम और अमीर बहुत जल्द रेशमी लिबास और ऐश-आराम में डूब गये। अबूबकर और उमर ने किस तरह बार-बार इन अफसरों की लानत-मलामत की, और उन्हें सजा दी, यहां तक कि इनकी फिजूलखर्ची पर आँसू भी बहाये, इसके बहुत-से किस्से बयान किये जाते हैं। ये महसूस करते थे कि सीधे-साधे और कठोर रहन-सहन में ही इनकी ताकत है, और उन्होंने कुस्तुन्तुनिया और ईरान के दरबारों जैसा ऐश-आराम अपना लिया तो अरब लोग भ्रष्ट हो जायेंगे और नीचे गिर जायेंगे।

 अबूबकर और उमर का शासन 12 साल रहा। लेकिन इस थोड़े से समय में ही अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य और ईरान के सासानी बादशाहों, दोनों को हरा दिया था। यहूदियों और ईसाइयों के पवित्र शहर यरूशलेम पर अर्बों ने कब्जा कर लिया था, और सारे सीरिया, ईराक और ईरान इस नये अरबी साम्राज्य के हिस्से बन चुके थे।


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