*प्राचीन भारत के ग्राम-गणराज्य ! Ancient Indian rural republics in hindi

 

प्राचीन ग्रामीण भारत !

 प्राचीन भारत के ग्राम-गणराज्य ! Ancient Indian rural republics in hindi

  विश्व की सभी सभ्यताओं में से भारतीय सभ्यता अति-प्राचीन और एक गौरवशाली सभ्यता रही है। इसकी संस्कृति विश्व-संस्कृतियों में सिरमौर पर है। आर्यों के भारत आने से पहले ही से यहां की संस्कृति एक उन्नत और विख्यात सँस्कृति थी, जो आगे चलकर आर्यों के सम्मिश्रण से एक गौरवशाली संस्कृति के रूप में विकसित हुई।

  प्राचीन भारत में व्यापार

  जो देश आज अफगानिस्तान कहलाता है वह उस समय, और बाद में भी बहुत वर्षों तक भारत का एक हिस्सा था। भारत का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा गांधार कहलाता था। सारे उत्तर में, सिन्ध और गंगा के मैदान में, आर्यों की बड़ी-बड़ी बस्तियां थीँ। बाहर से आये हुये ये आर्य लोग शायद  इमारतेंं बनाने की कला अच्छी तरह जानते थे, क्योंकि इनमें-से बहुत से ईरान और इराक की आर्यों की बस्तियों से आये हुये होंगे, जहां उस समय भी बड़े-बड़े शहर बस गये थे। इन आर्य-बस्तियों के बीच बहुत से जंगल थे, खासकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच में तो एक बहुत बड़ा जंगल था। यह संभव नहीं मालूम होता कि आर्य लोगों की कोई बड़ी संख्या इन जंगालों को पार करके दक्षिण में बसने गई हो। हां, बहुत-से व्यक्ति खोज और व्यापार करने तथा आर्य-सभ्यता और संस्कृती को फैलाने के लिये दक्षिण जरूर गये होंगे। पौराणिक कथा है कि अगस्त्य ऋषि पहले आर्य थे, जो दक्षिण गये और आर्य धर्म तथा आर्य-संस्कृति का संदेश दक्षिण तक ले गये।

 उस समय भारत और विदेशों के बीच काफी व्यापार चलता था। विदेशी व्यापारी दक्षिण की काली मिर्च, मोती और सोने के लालच से समुद्र पार करके यहां आते थे। यहां से शायद चावल भी बाहर जाता था। बाबुल (बेबिलोन) के पुराने राजमहलों में मलाबार का सागवान मिला है।

भारत में आर्यों की ग्रामीण प्रणाली

 आर्यों ने भारत में धीरे-धीरे अपनी ग्रामीण प्रणाली का विकास किया। इस प्रणाली में कुछ पुरानी द्रविड़-ग्राम-प्रथा का और कुछ आर्य-विचारों का मेल-जोल था। ये गांव करीब-करीब स्वतंत्र होते थे और चुनी हुई पंचायतें इन पर शासन करती थीं। कई गांवों या छोटे कस्बों को मिलाकर उनपर एक राजा या सरदार राज करता था, जो कभी तो चुना हुआ होता था और कभी पुश्तैनी। अकसर गांवों के अनेक समुदाय एक-दूसरे से सहयोग करके सड़कें, धर्मशालायें, सिंचाई के लिये नहरें, या इस प्रकार की सामुदायिक चीजें, जो सब लोगों के फायेदे की होती थीं, बनाया करते थे। यह भी मालूम होता है कि राजा यद्यपि राज्य का प्रमुख होता था, लेकिन वह मनमानी नहीं कर सकता था। उसे आर्यों के कानूनों और प्रथाओं के अनुसार चलना पड़ता था। उसकी प्रजा उस पर जुर्माना कर सकती थी। 'राजा ही राष्ट्र है' इस सिद्धांत को नहीं माना जाता था। इस तरह आर्य-बस्तियों में एक प्रकार का लोकतंत्र पाया जाता था, यानी आर्य-प्रजा शासन पर कुछ हद तक नियन्त्रण रख सकती थी। 

  प्राचीन सामाजिक वर्गीकरण

 इन भारतीय आर्यों का यूनानी आर्यों से मुकाबला करो। इन दोनों में बहुत से अन्तर थे, लेकिन कितनी ही बातों में समानता भी थी। दोनो देशों में किसी न किसी रूप में लोकतंत्र था। लेकिन हमें यह न भूलना चाहिये कि यह लोकतंत्र सिर्फ आर्य-वंश के लोगों के लिये ही था। इनके गुलामों या उन लोगों के लिये, जिन्हें इन्होने नीच जाति का ठहरा दिया था, न लोकतंत्र था, न आजादी। जात-पांत की प्रणाली और उसके आजकल जैसे अनगिनती भेद उस जमाने में नहीं थे। उस समय तो भारतीय आर्यों में समाज के चार भेद या वर्ण माने जाते थे। ब्राह्मण, यानी विद्वान, पुरोहित और ऋषि-मुनि; क्षत्रिय यानी राज करने वाले; वैश्य, यानी वाणिज्य और व्यापार करने वाले; और शूद्र, यानी मेहनत-मजदूरी करनेवाले और कामगार। इस तरह यह जातिभेद पेशे के आधार पर था। संभव है, जात-पांत की प्रणाली एक हद तक इसीलिये रक्खी गई हो कि आर्य लोग विजित जाति से अपने को अलग रखना चाहते थे। आर्य लोग इतने अभिमानी और घमंडी थे कि दूसरी जातियों को नीची निगाह से देखते थे और यह नहीं चाहते थे कि उनकी जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घुल-मिल जायँ। जाति के लिये संस्कृत में वर्ण शब्द आता है, जिसका अर्थ रँग है। इससे यह भी प्रकट होता है कि बाहर से आनेवाले आर्य भारत के मूल निवासियों से गोरे थे।

प्राचीन ग्रामीण भारत !

प्राचीन भारत में आर्यों का पतन

प्राचीन भारत में एक तरफ तो आर्यों ने श्रमिक वर्ग को दबा रक्खा था और उसे अपने लोकतंत्र में कोई हिस्सा नहीं देते थे; दूसरी तरफ उन्होने अपने लिये बहुत ज्यादा आजादी रक्खी थी। ये लोग इस बात को बिलकुल पसंद नहीं करते थे कि उनके राजा या शासक अनुचित व्यवहार करें। अगर कोई शासक अनुचित व्यवहार करता था तो हटा दिया जाता था। आमतौर पर राजा क्षत्रिय होते थे, लेकिन कभी-कभी लड़ाइयों या अन्य  संकटों के समय शूद्र या नीच-से-नीच जाति का आदमी भी, अगर इतना योग्य होता, तो राजगद्दी पा सकता था। इसके बाद आर्य लोगों का पतन हो गया और उनकी जाति-प्रणाली जड़ हो गई। बहुत से विभाग हो जाने की वजह से देश कमजोर पड़ गया और नीचे गिर गया। ये लोग आजादी की पुरानी भावना को भी भूल गये, क्योंकि पुराने जमाने में यह कहा जाता था कि आर्य कभी भी दास नहीं बनाया जा सकता। आर्य नाम को कलंकित करने के बजाये उसके लिये मर जाना कहीं ज्यादा अच्छा समझा जाता था।

आर्यों की रेखागणितीय बस्तियां

आर्यों की बस्तियां, कस्बे और गांव ऊटपटांग तरीके से नहीं बस गये थे। वे नक्शों के अनुसार बसाये जाते थे, और यह बात दिलचस्प मालूम होती है कि इन नक्शों के तैयार करने में रेखागणित से बहुत मदद ली जाती थी। सच तो यह है कि वैदिक पूजाओं में भी रेखागणित की शकलें काम आती थीं। आज भी अनेक हिन्दु घरों में बहुत-सी पूजाओं में ये शकलें काम आती हैं। बात यह है कि मकानों और शहरों की रचना से रेखागणित का बहुत निकट का संबन्ध है।

 संभव है, शुरु में पुराने आर्यों के गांव किलेबंद छावनी के समान हुआ करते थे, क्योंकि उस जमाने में हमलों का हमेशा डर रहा करता था। जब दुश्मनों के हमलों का डर नहीं रहा तब भी वही नक्शा जारी रहा। यह नक्शा चतुर्भुज आकार का होता था, जिसमें चारों तरफ परकोटा होता था और इसमें चार बड़े फाटक और चार छोटे दरवाजे रक्खे जाते थे। परकोटे के अंदर एक खास तरतीब में सड़कं और मकान बनाये जाते थे। गांव के बीच में पंचायत -घर होता था, जहां गांव के बड़े-बूढ़े इक्कठे होते थे। छोटे गांवोंमें पंचायत-घर के बजाये कोई एक बड़ा  पेड़ ही हुआ करता था। हर साल गांव के सब नागरिक इक्कठे होकर अपनी पंचायत चुनते थे।

प्राचीन भारतीय शिक्षा केंद्र

  बहुत से विद्वान लोग सादा जीवन बिताते और शान्ति के साथ अध्ययन या कार्य करने के लिये कस्बों या गांवों के आस-पास जंगलों में चले जाते थे। इनके पास शिष्य इक्कठे हो जाते थे और धीरे-धीरे इन गुरुओं और विद्यार्थियों की नई बस्तियां बनती गईं। हम इन बस्तियों को आजकल के विश्वविद्यालय कह सकते हैं। इन जगहों पर कोई शानदार इमारतें नहीं हुआ करती थीं, लेकिन जिनको  ज्ञान की तलाश होती थी वे बड़ी-बड़ी दूर से विद्या अध्ययन के इन केन्द्रों में आया करते थे।

प्राचीन भारतीय शहर

 ये प्रारम्भकाल के दिनों भारत में आर्यों का एक महान काल था।  दुर्भाग्य से इस काल का हमें कोई इतिहास नहीं मिलता और उस समय की जो बातें हमें मालूम हैं, उनके लिये हमें अनैतिहासिक ग्रंथों पर ही भरोसा करना पड़ता है। उस जमाने के राज्य और गणराज्य ये थे- दक्षिण बिहार में मगध; उत्तर बिहार में विदेह, काशी, कोशल- जिसकी राजधानी अयोध्या थी; और पांचाल, जो गंगा और यमुना के बीच में था। पांचालों के देश में मथुरा और कान्यकुब्ज दो मुखू शहर थे। ये शहर बाद के इतिहास में भी मशहूर रहे हैं और आज भी मौजूद हैं। कान्यकुब्ज अब कन्नौज कहलाता है और कानपुर के निकट है। उज्जैन भी प्राचीन शहर है।  पाटलिपुत्र या पटना के निकट वैशाली का नगर था। यह लिच्छविवंश के लोगों की राजधानी थी, जो भारत के शुरु-शुरु के इतिहास का एक मशहूर वंश है। यह राज्य गणराज्य था। इसमें प्रमुख व्यक्तियों की एक सभा शासन करती थी। इसका एक चुना हुआ सभापति होता था, जिसे नायक कहते थे।

 ज्यों-ज्यों जमाना गुजरा, बड़े-बड़े कस्बे और शहर बनते गये। व्यापार बढ़ा और कारीगरों की कला और दस्तकारी ने भी उन्नति की। शहर बड़े-बड़े व्यापारिक केंद्र हो गये। जंगल के आश्रम, जहां विद्वान ब्राह्मण अपने शिष्यों के साथ रहा करते थे, बढ़कर बड़े-बड़े विश्वविद्यालय बन गये। विद्या के इन केंद्रों में वे सब विषय पढ़ाये जाते थे, जिनका उस समय तक मनुष्यों को ज्ञान था। ब्राह्मण युद्धकला भी सिखाते थे। 


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