*आत्महत्या व अन्य परेशानियों का हल ! (कुछ जबरदस्त आध्यात्मिक तरीके)*


आत्महत्या व अन्य परेशानियों का हल! (कुछ जबरदस्त आध्यात्मिक तरीके)  

  मनुष्य को छोड़ अन्य जीव-जन्तु क्या आत्महत्या करते हैं ?
 वैज्ञानिक अनुसंधान में यह पाया गया है कि मनुष्य को छोड़ यदि कोई भी जीव या जन्तु आत्महत्या करे तो उसके पीछे का कारण यह होता है कि वह जीव या जन्तु अपने समाज के भले के लिये (उदाहरण, शहद की मक्खी और दीमक की चींटी)  ऐसा करता है। परन्तु जीव व जन्तुओं में आत्महत्या जैसी प्रवृति बहुत कम देखने को मिलती है, लगभग न के बराबर, क्योंकि उनके व्यक्तित्व में अहंकार नहीं होता। तो फिर मनुष्य में यह प्रवृति इतनी अधिक क्यों?

 कारण- मनुष्य की संरचना (लोग आत्महत्या क्यों करते हैं!) 

 मनुष्य की संरचना में प्रकृति ने उसके भीतरी संभाग में अहंकार- Ego को स्थापित किया है जिसके आधार पर ही कोई मनुष्य व्यक्ति बनता है। यह अहंकार कुछ अन्य उपगुणों के साथ मिल कर कार्य करता है। जैसे, काम (स्वार्थ), क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वैष।

  पढ़ने और सुनने में ये गुण, गुण नहीं बल्कि अवगुण लगते हैं, परन्तु ये गुण ही हैं, प्राण-शरीर के गुण।
 इस सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ *त्रिगुणों से संचालित है, जिनमें मनुष्य का शरीर भी सम्मिलित है।

  मनुष्य का शरीर *पांच-प्राणों से मिलकर बना है- पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश।
 जिनमें काम- पृथ्वी तत्व का, मोह- जल तत्व का, लोभ- वायु तत्व का, क्रोध- अग्नि तत्व का तथा अहंकार- आकाश तत्व का सूचक है। 

 इस समस्त ब्रहमांड में पंच-प्राण *त्रिगुणों के द्वारा ही संचालित है- *सत-*रज-*तम।

 अब मनुष्य जो की वास्तव में एक शुद्ध-जीवात्मा है, यदि वो इन त्रिगुणों के पराधीन हुआ इनमें से एक, दो या तीन तत्वों की अधिकता सहित उपगुणों का भोग करे तो प्राण तत्व का क्षय होना शुरु हो जाता है। यह ठीक ऐसा ही है जैसे मोबाइल की बेटरी का खर्च हो जाना या फिर ओवर चार्ज होने पर फट जाना।

 यदि रजोगुण के आवेश में मोह की अधिकता रही तो उस मनुष्य के जल तत्व पर कुप्रभाव पडना शुरु हो जाता है। इसी प्रकार सतोगुण या तमोगुण की किसी भी उपगुणों के साथ अधिकता या कमी रहने पर कुप्रभाव या अस्थिर शान्ति बनती है।


  मनुष्य की भीतरी संरचना में ये सब तथ्य एक वैज्ञानिक आंकलन हैं जिनमें कुछ भी असत्य नहीं।

  हम अपने चारों ओर हर तरह के मनुष्यों को देखते हैं और फिर उनके स्वभाव का विश्लेषण करना शुरु कर देते हैं। तो क्या कभी हमने स्वयं के स्वभाव का विश्लेषण किया है ? नहीं न। क्योंकि हमें बाहर देखने की आदत हो गई है, स्वयं के भीतर नहीं। 

स्वयं के भीतर देखने की कला (आत्महत्या से बचने के उपाय!) 

 ज्ञानियों और बुद्धों ने स्वयं के भीतर देखने की कलाएँ विकसित कीं हैं। जिनमें इस सृष्टि का पहला बुद्ध और ज्ञानी *भगवान शंकर जी हैं। आत्म-ध्यान की निरन्तर व उच्च अवस्था पर रहने के कारण ही उन्हें शिव कहा गया।
  स्वयं के भीतर देखने की कलाओं में मुख्यतः - *ध्यान, *ज्ञान और *योग हैं। 

 ध्यान:- किसी धारणा (ईश्वर या भगवान् या स्वयं की आत्मा) या शुन्य भाव पर स्वयं के भीतरी उपगुण> अहंकार को केंद्रित करने का नाम है।
 ज्ञान:- किसी धारणा (ईश्वर या भगवान् या स्वयं की आत्मा) या शुन्य भाव पर अथवा तर्क पर स्वयं के भीतरी उपगुण> अहंकार को किसी सूचना (Information n knowledge) के द्वारा केंद्रित करने का नाम है।
 योग:- ध्यान और ज्ञान के सहित स्वयं के भीतरी उपगुण> अहंकार को मिटाने का नाम है।

  इन उपरोक्त्त वैज्ञानिक तरीकों से बहुत कम लोग अपना जीवन जीते हैं। क्योंकि मनुष्यों के लिये विज्ञान का अर्थ केवल प्रयोगशाला विज्ञान तथा प्रोद्यौगिक विज्ञान ही है।

 आत्महत्या के सन्दर्भ में मनुष्य के भीतर केवल और केवल मनुष्य का प्रधान उपगुण *अहंकार ही कारक होता है।
 जब मनुष्य का अहंकार त्रिगुणों में से तमोगुण के अत्यन्त प्रभावाधीन हो जाता है तभी कोई मनुष्य आत्महत्या करता है।

 तमोगुण के सक्रिय होने से मनुष्य की बुद्धि कुर्बुद हो जाती है। उसकी सोचने और समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। वो तमोभावना के आवेश में केवल स्वयं के विलय के बारे में सोचने लगता है। वो उससे अधिक और कुछ सोचना ही नहीं चाहता है।

  मनुष्य के भीतरी व्यक्ति अथवा व्यक्तित्व पर चोट या बाह्या दबाव या कोई रास्ता (हल) न सूझने से भी मनुष्य तमोगुण के प्रभावाधीन हुआ यह कर्म करता है।

 समाधान  

जब कभी भी किसी मनुष्य के पास इस प्रकार की परिस्थिती आये तो उसे चाहिये कि वह तुरन्त *आध्यात्म की शरण में जाये, धर्म की नहीं। आध्यात्म की शरण में जा कर ध्यान और ज्ञान सहित योग का अभ्यास करे।

   *यहाँ ध्यान और योग का अर्थ गुरु *पतंजलि द्वारा प्रस्थापित ध्यान और योग नहीं।

 बल्कि ध्यान धरना होगा *प्रेम अथवा भक्ति पर।

ज्ञान लेना होगा *प्रेम, भक्ति और सृष्टि का। फिर स्वयं के भीतरी व्यक्तित्व को समस्त उपगुणों से हटाकर केंद्रित करना होगा, और यह केवल निरन्तर ध्यान और ज्ञान से ही संभव है।
 यदि कोई मनुष्य *गुरु पतंजलि की विधि भी अपनाता है तो वह विधि उपयोगी और सार्थक है।

 मनुष्य को चाहिये कि वे अपने चारों ओर के समाज में दृष्टी डाले और देखे कि अन्य मनुष्यों की तुलना में कोई आध्यात्मिक मनुष्य कितना स्वस्थ और शान्त-चित है। वह दुर्घटनाओं से परे है। क्योंकि काल का उस पर कोई जाल नहीं होता।

 आधुनिक बाबाओं और गुरुओं की ओर ध्यान मत दो। क्योंकि इनमें से अधिकांश का भीतरी मनुष्यत्व त्रिगुणों के पराधीन हुआ उपगुणों के वश में है। इन्होने आध्यात्म को बदनाम कर के रख दिया है। इन्होने आध्यात्म को धर्म का चोला पहनाया है। इनसे दूर रहो।

 Self-study करो, और अपने विवेक को जागृत रख कर कुछ-कुछ सच्चे आध्यात्मिक गुरुओं (शिक्षकों) से ज्ञान अर्जित करो।
  विभिन्न धर्मों की शालीन और अच्छी बातों की प्रतीति करो।
 उनमें निहित मानवतावादी तात्विक ज्ञान को आत्मसात करो।
 और सदैव *ज्ञान, *भक्ति और *प्रेम में लवलीन रहो।

  यह उपरोक्त तरीका न केवल आत्महत्या की प्रवृति को वरन मनुष्य की हर तरह की परेशानियों व विकृतियों का नाशक है। 
 हाँ, इसी तरीके को मनुष्य की (रुद्र की- रोने वाले की) *तीसरी आँख (Spiritual Eye - *सत (प्रेम)-*चित (ज्ञान)-*आनन्द (भक्ति)) कहते हैं !!!

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