*ब्रह्माण्ड का निर्माता कौन है?(कुछ जबरदस्त प्रयोगात्मक तर्क)?: (Who created Universe (Some experimental logics) in hindi?*

 
Who created universe in hindi !


 ब्रह्माण्ड का निर्माता कौन है?(कुछ जबरदस्त प्रयोगात्मक तर्क)?: Who created Universe(Some experimental logics) in hindi?

   Who created Universe:  हमारे सौर-मंडल में आठ ग्रह हैं। उन आठ ग्रहों में भी जीवन स्पष्ट रूप में केवल हमारी पृथ्वी पर ही फलीभूत है। बाकि के सात ग्रहों में जीवन नहीं है ऐसा भी हम कह नहीं सकते। क्योंकि हो सकता है कि वहाँ जीवन किसी और रूप में हो जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अधिकतर हम पृथ्वी-वासी केवल उन्हीं विषयों की कल्पना कर सकते हैं जो विषय हमारी पृथ्वी पर पाये जाते हैं या फिर जो हमारे अनुभव में आते हैं।
 पृथ्वी का जो रूप हम आज देखते हैं क्या वह अपने-आप से निर्मित है ? ऐसे कुछ बुनियादी सवाल हैं जिन पर समय-समय पर विचार किया जाता है। अधिकांश वैज्ञानिकों के द्वारा विचार-मंथन के बाद निष्कर्ष यही निकलता है कि वास्तव में यह सम्पूर्ण सृष्टि अपने-आप निर्मित नहीं है। बल्कि इसे निर्मित किया गया है। पर किसने, क्यों, कब और किसलिये ?

        सृष्टि निर्माण

   बनाने वाले ने जब यह सृष्टि बनाई तो उसने बृहत् सृष्टि बनाई। जिसमें पता नहीं कितने आकाशों, आयामों की सृष्टि की। कितने ब्रह्मांड बनाये। और कितने तारे, ग्रह इत्यादि बनाये इसे संपूर्णता से जान पाना असम्भव है। परन्तु यह जान पाना कठिन नहीं है कि किन दो मूल तत्वों से बनी है। आइये जरा समझते हैं सृष्टि के निर्माण को :-
  (1) बनाने वाला (सृजनहार) 
  (A) *वो ताकत या शक्ति जिससे उसने सृष्टि बनाई। जिसे धर्म-ग्रंथों में "शब्द अथवा रुद्र अथवा ओम अथवा वचन अथवा सृजनहार की बुद्धि" कहते हैं।
  (2) दूसरा वो तत्व जो जड़ है। जिसे विज्ञान की प्रयोगशाला में जांचा-परखा जा सकता है जिससे ही यह सम्पूर्ण जगत बनाया गया है।
 *परन्तु अभी भी विज्ञान ने इस सृष्टि में बहुत से असंख्य तत्वों की खोज नहीं की है।*
    उदाहरण के लिये, किसी भवन का निर्माण करने के लिये हमें बहुत सी चीजों की जरुरत पडती है। जैसे, ईंट-पत्थर, रेत, सीमेंट, पानी, धूप और श्रम। इनमें ईंट-पत्थर, रेत, सीमेंट, पानी और धूप तो पदार्थ (तत्व) हुये। परन्तु श्रम उस सृजनहार की शक्ति (वचन) अथवा सामर्थ्य है।
    जिस तरह कोई भी मनुष्य कोई भी काम व्यवस्थित ढंग से करता है। ठीक उसी तरह सृजनहार ने भी यह सृष्टि एक व्यवस्थित ढंग से बनाई है। इसमें एक इंच भी बिना व्यवस्था के नहीं।
   जब हम किसी घर, महल, कारखाने, खिलौने या फिर भोजन इत्यादि को देखते हैं तो तुरंत यह कहते हैं कि यह फलां चीज किसने बनाई। यह चाय किसने बनाई। यह कपड़े किसने सिले। तो जब हम इस सृष्टि के बारे में सोचते हैं तो यह क्यों कहते हैं कि यह अपने-आप है ?
 देखिये जरा इस सृष्टि को ध्यान से। कितनी महीन कारीगरी की गई है। जिसने भी यह कारीगरी की है वह वास्तव में हैरानी और प्रशंसा के काबिल है।
  अब इस पर कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं की यदि यह सृष्टि किसी के हाथों की कारीगरी है तो फिर जिसने यह सृष्टि बनाई वो स्वयं किसके हाथों की कारीगरी है ! 
 तो इसके जवाब में हम कुछ नहीं कह सकते हैं। किन्तु हम इस तर्क पर कायम रह सकते हैं कि यह सृष्टि वास्तव में किसी के हाथों (Supermind) की कारीगरी है। क्योंकि यहाँ कुछ भी अपने-आप नहीं होता। यहाँ हर पदार्थ अथवा तत्व को जो शक्ल दिया जाता है वास्तव में वो निर्मित है, अपने-आप नहीं।

  पृथ्वी पर के जीव

    इस पृथ्वी को बनाने वाले ने इसे मुख्यत: पंच-तत्वों से बनाया है। इस पृथ्वी पर के जीव जो नाना-प्रकार के हैं वे सब इन्हीं पंच-तत्वों से निर्मित हैं। परन्तु उनके निर्माण में तत्वों के नाप-तोल में उतार-चढ़ाव किया गया है।
 बनाने वाले ने मनुष्य से पहले जब अन्य प्राणियों की सृष्टि की तो उसने इस ढंग से उन्हें व्यवस्थित बनाया जिस ढंग से उसने सूर्य, चन्द्रमा और अन्य तारे बनाये। अर्थात उनके स्वभाव, ज्ञान (जानकारी), कार्य व उद्देश्य पहले ही निर्धारित कर दिये गये हैं।
  उदाहरणार्थ, किसी भी पशु-पक्षी व अन्य प्राणियों को देख कर हम उनके स्वभाव को पहचान लेते हैं। उनके ज्ञान को अथवा जानकारी को भी हम समझ सकते हैं। उन्हें इस पृथ्वी में कुछ भी सीखने व सिखाने की आवश्यकता नहीं होती। पैदा होते ही उन्हें शिक्षा व ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। पैदा होते ही उन्हें चलना-फिरना, तैरना, भोजन संग्रह करना, आक्रमण और स्व-रक्षा करने की कला सीखने की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि बनाने वाले ने (सृजनहार) उनके DNA में पहले ही से Install कर दिया है कि वह क्या हैं।
  परन्तु मनुष्य के संदर्भ में बात भिन्न है। सृजनहार ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तरह नहीं बनाया। उसे पैदा होते ही चलना सीखना पड़ता है। खाना खाना, खाना-बनाना, खेती करना, तैरना और बहुत कुछ करना उसे सीखना पड़ता है। उसे शिक्षा और ज्ञान की नितांत आवश्यकता पड़ती है। यदि पैदा होते ही किसी मनुष्य को कुछ भी सिखाया न जाये तो निश्चय ही वो वर्तमान मनुष्यों की तरह न होगा वरन कुछ भिन्न स्वभाव व ढंग का होगा। और यहाँ तक की शायद वो जी न पाये और उसकी मृत्यु ही हो जाये।
  *सृजनहार ने मनुष्य मस्तिष्क को Blank ही बनाया था। अर्थात कुछ फ़ीड नहीं किया था। परन्तु कुछ सीखने और समझने के लिये बुद्धि और विवेक अवश्य फ़ीड किये थे।
 इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य एक Innocent प्राणी है। सृजनहार ने उसके DNA में कुछ भी Install नहीं किया था जिससे वो इस जगत की बातों को अपने स्वभाव ही से जान ले। उसे इस जगत की हर बातों को जानने और समझने के लिये किसी दूसरे पर निर्भर होना पड़ता है।
   इसीलिये मानवता की अब तक की सम्पूर्ण संस्कृतियां व उपलब्धियां उसके अपने स्वयं के स्वभावगत ज्ञान की देन नहीं हैं। अपितु अतीत में समय-समय पर उसे ये सब ज्ञान किसी दूसरों के द्वारा दिये गये हैं।
 *अब ये दूसरे कौन हैं ?
   निश्चय ही वे इस पृथ्वी के प्राणी तो नहीं होंगे।
   हाँ, बहुत से ज्ञान मनुष्य ने इस पृथ्वी के अन्य प्राणियों से भी सीखा। परन्तु संस्कृति और सभ्यताओं के क्रम में जो उपलब्धि उसने हांसिल कीं वो निश्चय ही किसी और प्राणी या प्राणियों की देन हो सकती है जो की इस पृथ्वी के तो नहीं परन्तु इस पृथ्वी पर की तथा बाहर की बहुत सी बातों को वे अच्छे से जानते हैं।
  यही कारण है कि हमें मनुष्यों में बहुत भिन्नता दिखाई देती है। 
  जैसे, उसकी संस्कृतियां अलग-अलग हैं। उसकी आस्थाएँ, धारणायें, मान्यतायें अलग-अलग हैं। 
  ऐसा क्यों ?
  ऐसा इसीलिये है क्योंकि अतीत में अलग-अलग मनुष्य समाजों का सामना (रूबरू) अलग *बाह्या प्राणियों (पृथ्वी से बाहर के अथवा ऊपर के) से हुआ।
  परन्तु मूल रूप में क्या इस सृष्टि  का रचयिता *एक ही है या *त्रियेक (हम) या फिर हैं - *अनेक (हम) !
 यह विषय मानवता के लिये विवादास्पद है और साथ ही गहन चिंतन का विषय भी। परन्तु यह तो निश्चय ही है कि यह सृष्टि और इस सृष्टि पर के प्राणी बनाये गये हैं, और ये अपने-आप नहीं हैं।

2 टिप्पणियाँ

  1. ये तो आपने भी बिल्कुल आँख बंद करके विश्वास करने को कहा है!
    आखिर सृष्टि का रचयिता कोई हो सकता है! तो उसका भी तो कोई रचयिता होगा ना?
    जब रचयिता खुद से हो सकता है तो प्रकृति क्यों नहीं?

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    1. ब्रदर, इस सवाल का सरल सा उत्तर है जो कि वेदों के अनुसार है - ईश्वर और पृकृति दोनों अनादि हैं। दोनों ही स्वयंभू हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पृकृति जड़तत्व है और ईश्वर चेतनतत्व है। ईश्वर में इच्छायें, भावनाएं और जीवन होता है, और बुद्धि भी। परंतु प्रकृति में ऐसा कुछ नहीं होता। उसमें केवल उर्जायें होती हैं।

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