*भारतीय संविधान की रक्षा करें !*


  भारतीय संविधान की रक्षा करें ! 


    भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। यहां पर हर धर्म को फलने-फूलने की स्वतन्त्रता है। यहाँ पर किसी भी विचार, 
मत व धर्म-सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। निसन्देह, भारतीय संविधान में इस तरह की व्यवस्था करना एक गरिमा पूर्ण व प्रशंसनीय बात है। परंतु क्या कभी भारत के प्रबुद्ध वर्ग या जनसामान्य ने यह सोचा कि भारत की भूमि में इस तरह की व्यवस्था करने का भावी परिणाम क्या हो सकता है ? तो इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि यदि शीघ्र ही भारतीय संविधान के इस धर्म-निरपेक्ष मौलिक प्रावधान पर आवश्यक संशोधन न किया गया तो भारत निकट भविष्य में एक धर्म-निरपेक्ष राज्य न रह कर एक *धर्मतन्त्र* बन जायेगा। अर्थात जिस भी प्रचारक धर्म का प्रचार बहुतायत से होगा केवल वही इस राष्ट्र का राजधर्म बन जायेगा।

 बहरहाल हम सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म तो एक प्रचारक धर्म है नहीं। बुद्ध व जैन धर्म भी सिकुडे  हुये हैं। इसलिए भारत में यदि कोई प्रचारक धर्म हैं तो वे केवल इस्लाम व इसाई धर्म। इनमें भी भारत भूमि में इस्लाम धर्म की छवि तो आतंकवाद के कारण पहले ही धूमिल पडी हुई है। तो रहा इसाई धर्म, जिसके दोनों हाथ घी व शहद के बर्तन में डूबे हुये हैं। इसलिये निकट भविष्य में केवल यही धर्म इस राष्ट्र का राजधर्म होगा।

   हम सभी जानते हैं कि जब कभी भी कोई राष्ट्र धर्मतान्त्रिक राष्ट्र बन जाता है  तो उस राष्ट्र के लोगों की स्वतन्त्रता, खास करके अभिव्यक्ति व जीवन जीने की स्वतन्त्रता पर कोठाराघात होता ही है। 
 
अत: भारत की भूमि में केवल *ऐसे धर्मों के प्रचार-प्रसार की स्वतन्त्रता दी जाये जो उस धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र की आत्मा का विलय न करे।  जरा ध्यान से सोचो और समझो !  उदाहरण के तौर पर, जैसे कि इसाईयों को उनके धर्म का प्रचार करने की स्वतन्त्रता यहां पर है। वे यहां की भूमि के जनमानस में प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और लोग बहुतायत में उनके प्रभाव में आकर उस धर्म को गृहण भी कर रहे हैं। 
 
तो क्या कभी इस ओर ध्यान दिया गया कि वे प्रचार में क्या सुनते हैं और फिर क्या ग्रहण करते हैं ? हां, वे सुनते तो हैं कि येशू-मसीह मानवजाति के उद्धारक हैं। हां ठीक है अच्छी बात है और ग्रहण-योग्य भी है। परंतु उसके बाद वे उस धर्म में क्या ग्रहण करते हैं यह ध्यान देने योग्य बात है। 
 
वे ग्रहण करते हैं- अहिश्नुता, कट्टरता व अमानवीयता। 'अर्थात इसाई धर्म को छोड बाकि के सभी मत व धर्म शैतान की ओर से हैं, इसाईयों को छोड सभी मनुष्य शैतान की सन्तानें हैं, उनसे विवाह-शादी न करें क्योंकि उनके विचार दूषित हैं, बल्कि पहले हरेक शैतान की सन्तानों को इसाई बनाओ। तो इसका क्या अर्थ है?  इसका सीधा-सीधा सा अर्थ यह बनता है कि यदि बहुतायत से लोग इसाई बनते हैं तो भारत देश एक इसाई राष्ट्र में तबदील हो जायेगा। इस प्रकार भारत की आत्मा (संविधानिक प्रस्तावना) धराशायी हो जायेगी। जबरन यहां केवल इसी धर्म के मत का राज्य होगा, अन्य मतों व धर्मों की हत्या कर दी जायेगी।

  अत: एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते भारत के प्रत्येक नागरिक चाहे वे माननीय राष्ट्रपति जी हों, प्रधानमन्त्री या फिर अन्य मंत्रीगण या सांसद और प्रबुद्ध वर्ग तथा सामान्य नागरिक सबका यही कर्तव्य बन पड़ता है कि वे सभी भारतीय संविधान की रक्षा करें ! क्योंकि भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मौलिक प्रावधान *धर्म-निरपेक्षता* पर जो कि यहां के हरेक मनुष्य का मौलिक अधिकार है, शीघ्र ही धराशायी होने वाला है !

 इसाई धर्म और यीशु दो अलग-अलग विषय हैं। विश्व व भारतवर्ष के सन्दर्भ में यीशु के साथ-साथ इसाई धर्म का प्रचार-प्रसार हो रहा है और जनसामान्य यीशु से अधिक इसाई धर्म पर अपनी आस्था रखते हैं जो कि बहुत खेदजनक बात है ! इसाई धर्म हो या मुस्लिम धर्म इन दोनों का मूल *यहूदी धर्म में ही है। जिसके सिद्धांतों में- *अपने पडोसी से बैर रखना। *उनकी भावनाओं व विचारों का खण्डन करना। * उनकी आस्थाओं को शैतान की आस्था मानना। *स्वधर्म व काफीरों के रूप में दूसरों को देखना। *केवल परमेश्वर से अन्धा प्रेम रखना और मानवता को हेय-दृष्टी से देखने की परम्परा है। *मानवीय प्रेम व भाईचारे से बढ कर ईश्वर से प्रेम व संगठन की व्यवस्था से प्रेम की परम्परा है

  प्रभु यीशु ने अपनी तारीक में यहूदी धर्म का (*ओल्ड-टेस्टामेंट) खुल्लम-खुल्ला विरोध नहीं किया। क्योंकि वे जानते थे कि यदि उन्होनें ऐसा किया तो कोई भी उनकी नहीं सुनेगा। इसीलिए उन्होनें इसी यहूदी धर्म का सहारा लेकर लोगों को समझाया कि *परमेश्वर प्रेम है। और वह मानवीय भाईचारे, सदाचार व एक दूसरे की भावनाओं का आदर करने में निवास करता है। दरअसल प्रभु यीशु जी यहूदियों के ओल्ड-टेस्टामेंट के कट्टर विरोधी थे। क्योंकि इस व्यवस्था में इंसानी जान व इंसानी कमजोरियों और कमजोर भावनाओं के लिये कोई स्थान नहीं था। केवल दण्ड था। यीशु ने स्वर्गा-रोहण से पूर्व अपने शिष्यों से यह कहा था कि जाओ सारे सृष्टि के लोगों को यह बताओ कि परमेश्वर ने यीशु के बलिदान के रूप (प्रजापति का स्वयज्ञ) में सारी मानवता के लिये कर्म बन्धन से छुटकारा दे दिया है। सभी के लिये मोक्ष या अनन्त-जीवन की व्यवस्था यीशु मसीह में कर दी गई है। 

  यीशु ने यह नहीं कहा कि जगत के लोगों से कहो कि अपना-अपना धर्म छोड़ें, अपनी-अपनी संस्कृति छोडें। उन्होनें कहा कि केवल यह बताओ, जिस अज्ञानता के कारण उन्हें नरक मिलना था अब उन्हें नहीं मिलेगा। क्योंकि नरक का दण्ड यीशु ने एक बार ही में सारी मानवता के लिये भोग लिया है,' इसीलिए यीशु *मसीह कहलाये। जो कि वेदों व वेदान्तों तथा हिब्रू-ग्रन्थों की पूर्व भविष्यवाणी के अनुसार हुआ।

 परंतु अफसोस ! आज भी जो स्वयं को यीशु भक्त कहते हैं, अपनी अज्ञानता के कारण यीशु के उपर्युक्त कथन के विपरीत बाईबल के पुराने नियम की व्यवस्था का (कट्टरता) उपदेश अधिक करते हैं। सभी यीशु के पहाड़ी उपदेशों की अवहेलना करते हैं और कट्टरता का अनुपालन करते हैं। जो केवल एक सुसमचार था कि यीशु हम पापियों अर्थात हम अज्ञानियों के लिये मर कर जी उठे, अब धर्म बन गया है। येशू ने लोगों को *निर-ग्रन्थि करना चाहा, परंतु लोगों ने फिर भी ग्रन्थ ही को प्रिय जाना। सैंकडों वर्षों से केवल बाईबल के पुराने नियम की व्यवस्था का ही (कट्टरता) प्रचार-प्रसार हो रहा है अर्थात ये तेरा धर्म ऐसा तेरा धर्म वैसा, अन्यजाति (काफिर) आदि-आदि। यीशु में पवित्र-आत्मा के जीवन का प्रचार-प्रसार बहुत कम होता है। वास्तव में, सत्य जीवन में बहुत कम इसाई जीते हैं और उनकी रूचि भी नहीं होती। बहरहाल एक बदले रूप में लोग (विश्वासी बनकर) अपनी पुरानी बुराइयों के ही साथ (स्वभाव) एक कट्टरता भरा जीवन जीते हैं।' - यह एक जीवंत उदाहरण है कि *यीशु और *इसाईत दो अलग-अलग विषय हैं !

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