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ऋग्वेद और यजुर्वेद के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति और रचना कैसे हुई? : (भाग–1)
ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि से पहले क्या था?: जब भी हम रात के समय आकाश में असंख्य तारों को देखते हैं, तो हमारे मन में एक प्रश्न अवश्य उठता है—यह विशाल ब्रह्माण्ड कैसे बना? पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, समुद्र, पर्वत, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और हम मनुष्य कहाँ से आए? क्या इस संसार को किसी ने बनाया है, या यह अपने आप बन गया?
आज आधुनिक विज्ञान भी इस प्रश्न का उत्तर खोजने में लगा हुआ है। वैज्ञानिक बिग बैंग (Big Bang Theory) के माध्यम से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को समझाने का प्रयास करते हैं। लेकिन भारत के प्राचीन ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही इस विषय पर गहन चिंतन किया था। उन्होंने ध्यान, तप और आत्मानुभूति के माध्यम से सृष्टि के रहस्य को समझने का प्रयास किया और अपने अनुभवों को वेदों में व्यक्त किया।
ऋग्वेद और यजुर्वेद संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थों में गिने जाते हैं। इन वेदों में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे दार्शनिक रहस्य के रूप में मिलता है। आश्चर्य की बात यह है कि ऋग्वेद स्वयं यह स्वीकार करता है कि सृष्टि का रहस्य इतना गहरा है कि शायद उसका सम्पूर्ण ज्ञान केवल परमेश्वर को ही हो।
इस लेख में हम सरल भाषा में समझेंगे कि ऋग्वेद और यजुर्वेद के अनुसार सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई, सृष्टि से पहले क्या था, और परमेश्वर ने इस संसार की रचना किस प्रकार की।
ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि से पहले क्या था? | सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य (भाग–1)
वेद क्या हैं?
सृष्टि की चर्चा करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि वेद क्या हैं।
वेद हिन्दू धर्म के सबसे प्राचीन और सर्वोच्च ग्रन्थ माने जाते हैं। "वेद" शब्द संस्कृत की "विद्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है—जानना, ज्ञान प्राप्त करना।
चार वेद हैं—
ऋग्वेद
यजुर्वेद
सामवेद
अथर्ववेद
इन चारों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना जाता है। इसमें प्रकृति, देवताओं, ब्रह्माण्ड, यज्ञ, जीवन और परम सत्य से सम्बन्धित अनेक सूक्त हैं।
यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञ और कर्म की व्यवस्था बताता है, लेकिन इसमें परमेश्वर, प्रकृति और सृष्टि के विषय में भी अनेक महत्वपूर्ण मंत्र मिलते हैं।
क्या वेद सृष्टि की पूरी कहानी बताते हैं?
बहुत से लोग सोचते हैं कि वेदों में सृष्टि की रचना दिन-प्रतिदिन के क्रम में लिखी गई होगी, जैसे किसी कहानी में होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।
वेदों का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि "पहले यह बना, फिर वह बना।"
वेद इससे भी बड़ा प्रश्न पूछते हैं—
सृष्टि का मूल कारण क्या है?
यह संसार किससे उत्पन्न हुआ?
सृष्टि को चलाने वाला कौन है?
क्या सृष्टि हमेशा से थी या किसी समय उत्पन्न हुई?
क्या इसका कभी अन्त भी होगा?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए ऋषियों ने गहन चिंतन किया और अपने अनुभवों को मंत्रों के रूप में व्यक्त किया।
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सृष्टि से पहले क्या था?
यह संसार हमेशा से ऐसा नहीं था जैसा आज दिखाई देता है।
न पृथ्वी थी।
न सूर्य था।
न चन्द्रमा था।
न तारे थे।
न पर्वत थे।
न समुद्र थे।
न मनुष्य थे।
यहाँ तक कि समय की हमारी सामान्य समझ—दिन और रात—भी नहीं थी।
तो फिर उस समय क्या था?
इसी प्रश्न का उत्तर ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) में मिलता है।
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त
यह सूक्त संसार के सबसे गहरे दार्शनिक मंत्रों में से एक माना जाता है।
इसका पहला मंत्र है—
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं
नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्
अम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥
(ऋग्वेद 10.129.1)
सरल अर्थ
सृष्टि की उत्पत्ति से पहले न यह दृश्य संसार था और न ही उसका प्रकट रूप। न पृथ्वी थी, न आकाश था। उस समय ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे हम आज अपनी आँखों से देख सकें या समझ सकें।
ऋषि यहाँ कोई कहानी नहीं सुना रहे हैं। वे यह बता रहे हैं कि सृष्टि की प्रारम्भिक अवस्था हमारी सामान्य बुद्धि की पकड़ से बाहर थी।
"न सत् था, न असत्" — इसका क्या अर्थ है?
इस मंत्र की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है—
"न सत् था, न असत् था।"
पहली बार पढ़ने पर यह वाक्य थोड़ा कठिन लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि बिल्कुल कुछ भी नहीं था।
बल्कि इसका अर्थ यह है कि संसार अपने वर्तमान रूप में प्रकट नहीं हुआ था।
उदाहरण के लिए एक विशाल वटवृक्ष (बरगद का पेड़) बीज के भीतर छिपा रहता है। बीज को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उसके भीतर इतना बड़ा वृक्ष छिपा है। लेकिन वृक्ष की संभावना उसमें मौजूद रहती है।
ठीक उसी प्रकार सृष्टि भी अपनी अव्यक्त अवस्था में थी। वह प्रकट नहीं हुई थी, लेकिन उसकी संभावना विद्यमान थी।
क्या उस समय अन्धकार था?
ऋग्वेद आगे कहता है—
तम आसीत्तमसा गूढमग्रे।
अर्थात् प्रारम्भ में सब कुछ मानो गहरे अन्धकार से ढका हुआ था।
यहाँ "अन्धकार" का अर्थ केवल रोशनी का अभाव नहीं है। इसका अर्थ है—ऐसी अवस्था जहाँ कुछ भी अलग-अलग रूप में दिखाई नहीं देता था। न नाम था, न रूप था, न कोई भौतिक व्यवस्था।
दूसरे शब्दों में, सम्पूर्ण सृष्टि एक अत्यन्त सूक्ष्म और अप्रकट स्थिति में थी।
क्या उस समय केवल परमेश्वर थे?
नासदीय सूक्त में आगे कहा गया है—
आनीदवातं स्वधया तदेकम्।
अर्थात् उस समय केवल "वह एक" अपनी ही शक्ति से विद्यमान था।
ऋषि उस परम सत्ता का कोई नाम नहीं बताते। वे उसे केवल "एक" कहते हैं।
बाद में उपनिषद, वेदान्त और अन्य वैदिक ग्रन्थ उसी "एक" को ब्रह्म, परमात्मा या परमेश्वर के नाम से संबोधित करते हैं।
इसका अर्थ यह है कि सृष्टि की शुरुआत किसी अनेक शक्तियों से नहीं, बल्कि एक ही सर्वोच्च सत्य से मानी गई है।
क्या परमेश्वर ने अचानक सृष्टि बना दी?
ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि से पहले क्या था? इसमें हमें यहाँ एक रोचक बात सामने आती है,
ऋग्वेद यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने एक ही क्षण में पूरा ब्रह्माण्ड बना दिया।
इसके बजाय वेद संकेत देता है कि सृष्टि क्रमशः प्रकट हुई।
पहले वह अव्यक्त थी।
फिर उसके प्रकट होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई।
आगे के मंत्रों में बताया गया है कि यह प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी और "हिरण्यगर्भ" का क्या महत्व है। इसी विषय को हम लेख के अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।
पहले भाग का सार
अब तक हमने जाना कि—
वेद संसार के सबसे प्राचीन ज्ञानग्रन्थ हैं।
ऋग्वेद और यजुर्वेद सृष्टि को केवल कहानी नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक रहस्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
सृष्टि से पहले पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और जीव-जगत अपने वर्तमान रूप में मौजूद नहीं थे।
सम्पूर्ण सृष्टि एक अव्यक्त अवस्था में थी।
उस समय केवल एक परम सत्य या परमेश्वर विद्यमान था।
सृष्टि की रचना एक क्रमिक प्रक्रिया के रूप में आरम्भ हुई।
अगले भाग में क्या पढ़ेंगे?
अगले भाग में हम जानेंगे—
हिरण्यगर्भ क्या है?
क्या वेद वास्तव में "स्वर्ण अण्डे" की बात करते हैं?
सृष्टि का पहला प्रकट रूप क्या था?
यजुर्वेद परमेश्वर और सृष्टि के सम्बन्ध को कैसे समझाता है?
क्या विज्ञान और वेद की कुछ बातें एक-दूसरे के निकट दिखाई देती हैं?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम भाग–2 में सरल भाषा में समझेंगे।
📖 इस श्रृंखला का अगला लेख पढ़ें:
हिरण्यगर्भ क्या है? ऋग्वेद और यजुर्वेद के अनुसार सृष्टि की शुरुआत (भाग–2)

