![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
हिरण्यगर्भ क्या है? ऋग्वेद और यजुर्वेद के अनुसार सृष्टि की शुरुआत (भाग–2)
पिछले भाग में हमने जाना कि सृष्टि की उत्पत्ति से पहले यह संसार अपने वर्तमान रूप में नहीं था। न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चन्द्रमा। सम्पूर्ण सृष्टि एक अव्यक्त अवस्था में थी और केवल एक परम सत्ता विद्यमान थी।
अब प्रश्न यह उठता है कि उस अव्यक्त अवस्था से यह विशाल ब्रह्माण्ड कैसे प्रकट हुआ?
ऋग्वेद और यजुर्वेद इस प्रश्न का उत्तर अत्यन्त रोचक ढंग से देते हैं।
हिरण्यगर्भ क्या है?
ऋग्वेद के दसवें मण्डल में एक प्रसिद्ध सूक्त है, जिसे हिरण्यगर्भ सूक्त कहा जाता है।
इसका पहला मंत्र है—
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे
भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋग्वेद 10.121.1)
सरल अर्थ
सृष्टि के प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ प्रकट हुआ। वही समस्त प्राणियों का स्वामी बना और उसी ने पृथ्वी तथा आकाश को धारण किया।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
क्या हिरण्यगर्भ सचमुच एक "स्वर्ण अण्डा" था?
बहुत से लोग "हिरण्यगर्भ" का अर्थ केवल सोने का अण्डा समझ लेते हैं, लेकिन वैदिक विद्वान बताते हैं कि यह शब्द मुख्यतः एक प्रतीक है।
हिरण्य का अर्थ है—स्वर्णिम, तेजस्वी या प्रकाशमय।
गर्भ का अर्थ है—बीज, मूल या वह अवस्था जिसमें सृष्टि की सम्भावना छिपी हो।
अर्थात् हिरण्यगर्भ उस प्रथम सृजनात्मक अवस्था का प्रतीक है, जहाँ से सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार आरम्भ हुआ।
यह आवश्यक नहीं कि इसे किसी भौतिक अण्डे के रूप में ही समझा जाए। वैदिक परम्परा में इसे सृष्टि के प्रथम प्राकट्य का दार्शनिक प्रतीक भी माना गया है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
क्या हिरण्यगर्भ ही परमेश्वर है?
इस विषय पर विभिन्न वैदिक और वेदान्त परम्पराओं में कुछ भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं।
कई आचार्य हिरण्यगर्भ को परमेश्वर की सृजनात्मक शक्ति का प्रथम प्राकट्य मानते हैं, जबकि कुछ इसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म रूप का नाम बताते हैं।
लेकिन लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि हिरण्यगर्भ स्वयं से उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि उसका आधार परमेश्वर ही है।
अर्थात्—
परमेश्वर कारण है और हिरण्यगर्भ सृष्टि के प्रकट होने की प्रथम अवस्था का प्रतीक है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
सृष्टि का विस्तार कैसे हुआ?
ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि एक ही क्षण में पूरी तरह तैयार नहीं हो गई।
सबसे पहले—
सूक्ष्म अवस्था थी।
फिर सृष्टि का प्रथम प्राकट्य हुआ।
उसके बाद धीरे-धीरे आकाश, पृथ्वी और अन्य तत्वों की व्यवस्था बनी।
आगे चलकर जीव-जगत का विकास हुआ।
वेद इस प्रक्रिया को किसी वैज्ञानिक पाठ्यपुस्तक की तरह विस्तार से नहीं बताते, बल्कि यह बताते हैं कि सृष्टि एक सुव्यवस्थित नियम के अनुसार प्रकट हुई।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
यजुर्वेद परमेश्वर के बारे में क्या कहता है?
यजुर्वेद में परमेश्वर का स्वरूप अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में बताया गया है।
यजुर्वेद (40.8) का प्रसिद्ध मंत्र है—
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
सरल अर्थ
परमेश्वर सर्वव्यापक है। उसका कोई भौतिक शरीर नहीं है। वह शुद्ध है, निष्पाप है और किसी भी प्रकार के दोष से रहित है।
इस मंत्र से यह स्पष्ट होता है कि वेदों के अनुसार परमेश्वर कोई सीमित शरीर वाला प्राणी नहीं है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त सर्वोच्च चेतना है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
यदि परमेश्वर निराकार है, तो सृष्टि कैसे बनाता है?
यह प्रश्न स्वाभाविक है।
यदि परमेश्वर का शरीर नहीं है, तो वह सृष्टि की रचना कैसे करता है?
वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार परमेश्वर मनुष्य की तरह हाथों से निर्माण नहीं करता।
वह अपनी ज्ञान-शक्ति, इच्छा-शक्ति और नियमों के द्वारा सृष्टि की व्यवस्था को संचालित करता है।
जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम पूरी पृथ्वी पर कार्य करता है, लेकिन हम उसे आँखों से नहीं देख सकते, उसी प्रकार परमेश्वर की व्यवस्था सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कार्य करती है।
यह उदाहरण केवल समझाने के लिए है; इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर केवल एक प्राकृतिक नियम है। वैदिक परम्परा परमेश्वर को चेतन, सर्वज्ञ और जगत का परम नियन्ता मानती है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
क्या सृष्टि अपने आप बन गई?
ऋग्वेद इस प्रश्न पर भी विचार करता है।
नासदीय सूक्त के अंतिम मंत्र में ऋषि अत्यन्त विनम्रता से कहते हैं—
इस सृष्टि का वास्तविक रहस्य कौन जानता है?
और आगे यह भी कहते हैं कि—
संभव है कि इसका पूर्ण ज्ञान केवल वही परम सत्ता जानती हो, जिससे यह सृष्टि सम्बद्ध है।
यह वैदिक साहित्य की एक अनूठी विशेषता है। यहाँ अन्धविश्वास के स्थान पर जिज्ञासा, विनम्रता और सत्य की खोज का भाव दिखाई देता है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
क्या वेद और विज्ञान में कोई समानता है?
आज विज्ञान कहता है कि ब्रह्माण्ड का एक प्रारम्भिक चरण था और समय के साथ उसका विस्तार हुआ।
वेद भी बताते हैं कि सृष्टि एक अव्यक्त अवस्था से क्रमशः प्रकट हुई।
लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि वेद आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों की पुस्तक नहीं हैं, और न ही बिग बैंग सिद्धान्त का प्रत्यक्ष वर्णन करते हैं।
कुछ लोग दोनों के बीच समानताएँ देखते हैं, जबकि अन्य विद्वान इन्हें अलग-अलग ज्ञान परम्पराएँ मानते हैं।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि वेद और विज्ञान दोनों सृष्टि के रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनकी भाषा, उद्देश्य और पद्धति अलग-अलग है।
![]() |
| हिरण्यगर्भ क्या है? : सृष्टि की रचना का पहला चरण! |
सृष्टि का संचालन कौन करता है?
यजुर्वेद के अनुसार—
परमेश्वर ही जगत का सर्वोच्च नियन्ता है।
वही प्राकृतिक नियमों की व्यवस्था का आधार है।
वही सभी जीवों को कर्म करने की स्वतंत्रता देता है।
उसी के नियमों से सम्पूर्ण सृष्टि संतुलित रहती है।
इसलिए वैदिक दृष्टि में सृष्टि कोई अव्यवस्थित घटना नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित व्यवस्था है।
अब तक हमने जाना कि—
हिरण्यगर्भ सृष्टि के प्रथम प्राकट्य का वैदिक प्रतीक है।
परमेश्वर सृष्टि का मूल कारण और सर्वोच्च आधार है।
यजुर्वेद परमेश्वर को निराकार, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ बताता है।
सृष्टि क्रमिक रूप से प्रकट हुई, न कि अचानक पूर्ण रूप में।
वेद सृष्टि के रहस्य पर गहन विचार करते हैं और सत्य की खोज के लिए विनम्र दृष्टिकोण अपनाते हैं।
वेद और विज्ञान दोनों ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर विचार करते हैं, लेकिन उनकी कार्य-पद्धति और उद्देश्य भिन्न हैं।
भाग–3 में हम जानेंगे—
क्या ब्रह्मा का उल्लेख ऋग्वेद और यजुर्वेद में मिलता है?
प्रजापति कौन हैं और उनका सृष्टि से क्या सम्बन्ध है?
पंचमहाभूतों की अवधारणा कैसे विकसित हुई?
जीवों और मनुष्य की उत्पत्ति को वैदिक और उत्तरवैदिक परम्पराएँ किस प्रकार समझाती हैं?
सृष्टि के चक्र (सृष्टि–स्थिति–प्रलय) का क्या अर्थ है?
इन सभी विषयों को हम सरल भाषा और वैदिक संदर्भों के साथ समझेंगे.........Click here








