*10 कारण जो सनातन धर्म को हिन्दू धर्म से अलग करते हैं! (Sanatan dharm in hindi)*

Sanatan dharm in hindi


 10 कारण जो सनातन धर्म को हिन्दू धर्म से अलग करतें हैं! (Sanatan dharm in hindi)

आज के इस लेख में हम Sanatan dharm kya hai? के बारे में जानेंगे। हम सभी यह जानते हैं कि आदिकाल में अलग-अलग तरह के धर्म नहीं हुआ करते थे। उस समय पूरे सँसार भर में प्रकृति और प्रकृति के विभिन्न अवयवों की उपासनायें अलग-अलग ढँगों से हुआ करती थीं। ऐसा माना जाता है कि भारतीय सनातन धर्म इन्हीं प्राचीन उपासनाओं का संपूर्ण ज्ञान है जिसे अति प्राचीनकाल में भारतीयों ने लिपिबद्ध करके रखा। इस लेख में हम इसी सनातन धर्म (bhartiya darshan) के सार के बारे में जानेंगे।


  1.*सनातन कोई धर्म नहीं है।

 हाँ, यह बात आपको जरा अचरज भरी जान पड़ेगी, पर यही सच है ! जब हम सनातन धर्म से संबंधित समस्त श्रुतियों, कृतियों और दार्शनों को पढ़ते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि वाकेई में यह कोई धर्म न होकर के एक जीवन का बहुआयामी दार्शन है। 


 सनातन का मूल स्त्रोत जो चार वेद है, उनकी ऋचाएँ वास्तव में एक काव्यात्मक शैली में लिखी गई Philosophy है। षठदार्शन में उन्हें विस्तृत रुप में व्याख्यित किया गया है। जबकि भगवतगीता में उन दार्शनों का निचौड़ एक सार रुप में किया गया है। ये स्मृतियाँ और अलग-अलग तरह के पुराण वास्तव में उन मूल प्राचीन लेखों की व्याख्याएँ नहीं हैं बल्कि बहुत समय बाद, बाद के लोगों के द्वारा अपनी-अपनी समझ से लिखी गईं व्याख्याएँ हैं।


 सनातन वास्तव में कोई धर्म (Religion) नहीं था, परंतु बाद के व्याख्याकारों ने स्मृतियों और पुराणों को आधार बना के उसे एक धर्म बना दिया। जिसे आज हम हिन्दू धर्म या सनातन धर्म कहते हैं।


2.*सनातन धर्म में कोई ईश्वर की अवधारणा नहीं।

सनातन दार्शन ब्रह्मतत्व, परब्रह्मतत्व, परमब्रह्मतत्व और प्रकृति की बात करता है न कि किसी व्यक्ति-ईश्वर की बात करता है।


 अन्य धर्मों में, विशेष रुप से इब्राहिमिक धर्मों (यहुदी, ईसाई व इस्लाम में) में ईश्वर कोई व्यक्ति की तरह है या यूँ कहें कि वह एक व्यक्ति है। जबकि सनातन दार्शन में ईश्वर की परिभाषा इसके सर्वदा उलट है। ईश्वर या ब्रह्मतत्व सनातन दार्शन के नजरिये में कोई व्यक्ति न होकर मात्र तत्व है। कोई ऐसी चेतन शक्ती, जिसके कारण ही यह दुनियाँ जीवंत है।


3.*सनातन धर्म में सृजनवाद (Creationism) की अवधारणा नहीं है।

 चूँकि भारतीय दार्शन एक धर्म नहीं है इसलिए इस दार्शन में सृजनवाद की कोई अवधारणा नहीं है। अन्य धर्मों में जैसे, यहुदी, ईसाई और इस्लाम धर्म में कोई एक ईश्वर है जो ऊपर स्वर्ग में बैठा हुआ है और उसने अपने शब्दों की मायाजाल से इस सृष्टि की दुखदाई रचना की।


 परंतु सनातन दार्शन में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि ऊपर स्वर्ग में कोई परमेश्वर बैठा है और उसने दुनियाँ की रचना की। बल्कि इसके उलट सनातन दार्शन में केवल यह कहा गया है कि ईश्वरतत्व जब प्रकृति से मेल करते हैं तो प्रकृति जीवंत होकर स्वयं अपनी रचना करती है। 


 ये ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य दिव्य शक्तियाँ वास्तव में इसी प्रकृति के वे पुंज (अवयव) हैं जिनसे सृजना, संरचना, संचालन, विकास तथा विघटन व पुनर्स्थापना का काम होता रहता है।


 4.*सनातन धर्म का मूल निष्काम कर्म है।

यदि हम सभी धर्मों का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि उनमें से किसी भी धर्म में निष्काम कर्म की भावना एक प्रेरणा के रुप में नहीं पाई जाती है। उनमें सुख पाने व स्वर्ग की अभिलाषा की कामना भी सकाम भाव से पूरी करने का विधान है। 


 तुम किसी का बुरा मत करो, भला करो तो तुम्हें भला ही मिलेगा। तुम अच्छा करो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। पृथ्वी पर के सुख की कामना होती है और स्वर्ग से परे की कल्पना तक उनमें नहीं की गई है। उनमें दुखों से मुक्ति की बात तो की गई है परंतु मोक्ष की बात नहीं की गई है, क्योंकि वे मोक्ष के बारे में जानते ही नहीं हैं। जबकि मोक्ष का अर्थ होता है अपने मोह का क्षेय करना, यानि कि जीवन में दुख और सुख की भावना से सदा के लिए मुक्त हो जाना।


ईसाइयों और मुसलमानों की मुक्ति वास्तव में केवल जीवन से दुखों की मुक्ति है और स्वर्ग में केवल अनंत सुख की कामना। इन धर्मों का उद्देश्य केवल दुख से मुक्त होकर सकाम भाव से स्वर्ग में अनंत सुख पाना है। 


अनन्त सुख का मतलब होता है कि जो सुख कोई मनुष्य पृथ्वी पर के अपने सुख के क्षण में पाता है वह सुख स्वर्ग में वह असीमित समय के लिए पायेगा।


 जबकि भारतीय दार्शन की अवधारणा में ऐसी सुख की कामना भी एक बंधन के रुप में माना गया है। क्योंकि यदि दुख है तो सुख भी है और यदि सुख है तो दुख भी अवश्य ही है। यह ठीक दिन और रात की तरह होते हैं। 


 मोक्ष का आशय है परमानंद की अवस्था में आना। यह केवल दुख और सुख के मायाजाल को तोड़ के ही प्राप्त किया जा सकता है। बुरे और भले के फल के बीज को स्वयं के भीतर से उलीच के फैंक कर, दुख और सुख की भावना को त्याग कर, स्वयं के अहंकार को भूल कर तथा स्वयं को प्रकृति से अलग जान कर मोह से रहित होकर ही प्राप्त किया जा सकता है।


 और यह केवल तभी हो सकता है जब मनुष्य यह जानने की कोशिश करे कि सनातन धर्म क्या है?, और जानते हुए स्वयं के आध्यात्मिक विकास से सभी धर्मों (Religions) को छोड़ कर एक मात्र जीवन तत्व (अपनी चेतना) की ओर अपना ध्यान लगाते हुये स्वाध्याय करे। फिर मनुष्य के जीवन में एक समय जरुर आयेगा जब वह मोक्ष परायण होता हुआ मोक्ष की गति को प्राप्त होगा।


5.*सनातन धर्म के अनुसार सृष्टि मकड़ी का जाला है।

भारतीय दार्शन के अनुसार मनुष्य त्रिगुणों के पराधीन हुआ अपनी दुनियाँ आप बुनता है, ठीक किसी मकड़ी की तरह। यहाँ वह अप्ने सुखों और दुखों के लिए स्वयं जिम्मेवार है। जिस दिन मनुष्य को यह पता चलेगा कि वह जिस जाले को स्वयं बुन रहा है उसका अंत केवल उसी के जीवन का अंत है, और यह क्रम बारंबार उसके जीवन में घटित होता रहता है जब तक की वह जाला बुनना बन्द नहीं कर देता है। 


 जिस दिन या क्षण कोई मनुष्य मकड़ी की भान्ति अपने स्वयं के जीवन में जाला बुनना बन्द कर देता है तो वह जीवन रुपी इस मोह-मायाजाल से वह बाहर निकल जाता है और परमानंद की अवस्था में लीन हो जाता है।

Sanatan dharm in hindi



6.*सनातन धर्म में देवपूजा का विधान है पर देव भक्ति का नहीं।

सनातन दार्शन के अनुसार मनुष्य स्वयं के भौतिक जीवन की उन्नति और रक्षण के लिए विभिन्न दिव्य शक्तियों की पूजा तो कर सकता है परंतु भक्ति नहीं। भगवतगीता में लिखा है कि जिस क्षण कोई मनुष्य उनकी भक्ति करता है उसी क्षण वह उन उन दिव्य शक्तियों को प्राप्त हो जाता है अर्थात दुनियावी मायाजाल (प्रकृति) में फंसा रहता है।


 वास्तव में किसी भी दिव्य शक्ती की पूजा एक आदर करने और अपनी भौतिक जरूरतें पूरा करवाने का माध्यम मात्र है।


 7.*सनातन धर्म मेंं भगवान की अवधारणा है।

 यहाँ सर्वोच्च ब्रह्मतत्व को निर्गुण व निराकार अथवा अनदेखा माना गया है। जिसके होने मात्र से यह दुनियाँ है। परंतु भगवान इससे सर्वथा भिन्न है। वह प्रकृति से उत्त्पन्न एक दिव्य जीव है जो मुख्य रुप से तीन देवों के रुप में विभक्त है। वही नैसर्गिक रुप से इस दुनियाँ को बनाता, चलाता और समाप्त करता है। परंतु भगवान के द्वारा दुखों से मुक्ति तो मिल सकती है किन्तु मोक्ष नहीं मिल सकता। लेकिन भगवान का विज्ञानमय रुप ब्रह्मतत्व तक पहुंचने की सीढ़ी बन सकता है।


8.*सनातन धर्म में मूर्ती पूजा का विधान नहीं है।

भारतीय दार्शन में यदि हम विभिन्न षठदार्शनों व गीता को पढ़ें तो पायेंगे कि कहीं भी मूर्ती पूजा या प्रतीक पूजा का विधान नहीं है। वेदों में तो कहा भी गया है कि 'मूर्ती पूजा महापाप है।' महापाप का अर्थ है मनुष्य की अज्ञानता।


ये प्रतीक और मूर्ती पूजा का विधान आज से 1500 से 2000 वर्ष पूर्व ही भारत में प्रचलित हुआ था। गर्भगृहों (मंदिरों) का विधान भी पुराणों के अनुसार है न कि वेदों और षठ दार्शनों के अनुसार। ये पंडित पुरोहित, ब्राह्मण बगैरा सभी स्मृतियों और पुराणों के अनुसार हैं।


 9.*अतीत में सनातन दार्शन में कई पंथ उत्पन्न हुये। 

यदि हम इतिहास का बारीकी से अध्ययन करें तो पता चलता है कि भारतीय दार्शन में कई पंथ उत्पन्न हुये थे जिनमें यहुदी, ईसाई और इस्लाम धर्म भी शामिल हैं। इब्राहिमिक धर्मों ने सनातन दार्शन शास्त्रों को अपने हिसाब से जाना। उन्होने यह समझा कि यह प्रकृति भी उसी ब्रह्मतत्व से उत्पन्न हुई है न कि उसकी संगिनी है। वहीं से एकेश्वरवाद की अवधारणा उत्पन्न हुई। जबकि सनातन दार्शन की मूल भावना में ब्रह्म और प्रकृति दोनों का अस्तित्व एक साथ है। प्रकृति आकार और प्रकार है, और यह जीव की संरचना है जबकि ब्रह्म केवल जीवन है।


इनके अतिरिक्त भी भारत में बहुत से पंथ उत्पन्न हुये हैं जिन्होने सनातन दार्शन को धर्म में परिवर्तित करने की कोशिशें की हैं। ये सभी पारंपरिक पंथ हैं, जैसे, शैवमत, वैष्णवमत, शाक्यमत और भी अलग-अलग मत, जो अपने हिसाब से सृजनवाद की अवधारणा को स्थापित करते हैं और इस तरह भारत में धर्म की स्थापना करते हैं।


10.*सनातन धर्म में जातिप्रथा नहीं है।

वेदों व दार्शनों में जातिपाति जैसी कुप्रथा वर्णित नहीं है। चारवर्ण जो ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से उत्पन्न हुये वे मात्र एक फिलोसोफी व्याख्या है न कि एक वास्तविक घटना। यह चेतना की एक काल्पनिक या यूँ कहो एक परिकल्पना है।


 जातिप्रथा तो स्मृतियों की देन (विशेषकर मनुस्मृति) है, जो की सनातन दार्शन का हिस्सा नहीं है। मनुस्मृति ने सनातन दार्शन को भारत में हिन्दू धर्म बनाया। जबकि यह कोई धर्म था ही नहीं। यहाँ तो जीवन जीने के अपने-अपने निराले दार्शनिक तरीके थे। यहाँ लोग षठ दार्शनों के अनुसार अपना जीवन जीते थे। जिसे जो दार्शन ठीक लगता था वह उसी दार्शन का अनुसरण करता था। क्योंकि यहाँ तो चार्वाक जैसे दार्शन भी थे जो ब्रह्मतत्व या ईश्वरतत्व को नहीं मानते थे। 


तो यहाँ भारत की भूमी में अन्य दार्शनिक अनुयायियों के साथ-साथ नास्तिक दार्शन के अनुयायी भी रहा करते थे, और वो भी बिना किसी कुण्ठा भाव के, बिना बैरभाव के।


 यहाँ की भूमी में हठधर्मीता नहीं थी। क्योंकि हठधर्मीता या कट्टरता केवल धर्मों (Reliogions) की देन होती है, दार्शनों की नहीं।


तो संक्षेप में हमने जाना कि सनातन धर्म क्या है, और भारतीय सनातन दार्शन एक धर्म न होकर के मात्र एक दार्शन है। यह अस्तित्व और जीवन जीने और जीवन से सदा मुक्त होने की सुन्दर व निराली व्याख्या है।


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