मृत्यु के बाद का सफर: हिंदू धर्म, इस्लाम और बाइबल क्या कहते हैं?

 

मृत्यु के बाद का सफर!


मृत्यु के बाद का सफर: हिंदू धर्म, इस्लाम और बाइबल क्या कहते हैं?

Life After Death: इंसानी सभ्यता की शुरुआत से ही एक सवाल हमें सबसे ज्यादा परेशान करता रहा है: "जब धड़कनें रुक जाती हैं, तो क्या सब खत्म हो जाता है?" अलग-अलग धर्मों ने इस रहस्य की गुत्थी को अपने-अपने तरीके से सुलझाने की कोशिश की है। आइए जानते हैं कि इन तीन प्रमुख विचारधाराओं में मृत्यु के बाद की यात्रा कैसी बताई गई है।


1. हिंदू धर्म: पुनर्जन्म और कर्म का चक्र

हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक 'बदलाव' माना गया है। जैसे हम पुराने कपड़े बदलकर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है।

  • आत्मा की अमरता: श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं और न आग जला सकती है। यह सनातन है।

  • कर्म का सिद्धांत: मृत्यु के बाद का सफर पूरी तरह से व्यक्ति के 'कर्मों' पर निर्भर करता है। अच्छे कर्म स्वर्ग की ओर और बुरे कर्म नर्क की ओर ले जाते हैं, लेकिन ये दोनों ही पड़ाव अस्थायी हैं।

  • पुनर्जन्म: जब तक आत्मा को 'मोक्ष' (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) प्राप्त नहीं होता, वह 84 लाख योनियों में भटकती रहती है।

  • यमलोक की यात्रा: गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद के 13 दिनों और यमलोक की यात्रा का विस्तार से वर्णन है, जहाँ चित्रगुप्त व्यक्ति के पाप-पुण्य का हिसाब करते हैं।


मृत्यु के बाद का सफर!


2. इस्लाम: बरज़ख और कयामत का इंतज़ार

इस्लाम में मृत्यु के बाद के सफर को एक पड़ाव माना गया है, जहाँ रूह (आत्मा) अपने अंतिम फैसले का इंतज़ार करती है।

  • बरज़ख: मृत्यु और 'कयामत' (न्याय का दिन) के बीच के समय को 'बरज़ख' कहा जाता है। यह एक रूहानी पर्दा है जहाँ इंसान अपनी कब्र में रहता है।

  • मुनकर और नकीर: मान्यता है कि कब्र में दो फरिश्ते (मुनकर और नकीर) व्यक्ति से उसके रब, धर्म और नबी के बारे में सवाल पूछते हैं।

  • यौम-अल-कियामा (न्याय का दिन): इस्लाम के अनुसार, एक दिन पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी और अल्लाह सभी को दोबारा जीवित करेगा। उस दिन 'मीज़ान' (तराजू) पर कर्मों को तोला जाएगा।

  • जन्नत और जहन्नुम: जिनके नेक अमल (अच्छे काम) ज्यादा होंगे, वे जन्नत (स्वर्ग) जाएंगे और जो गुनहगार होंगे, उन्हें जहन्नुम (नरक) में भेजा जाएगा। यह फैसला स्थायी होता है।


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3. बाइबल (ईसाई धर्म): न्याय और अनंत जीवन

ईसाई धर्म में मृत्यु को पाप का परिणाम माना गया है, लेकिन ईसा मसीह (जीसस) पर विश्वास के जरिए 'अनंत जीवन' की आशा दी गई है।

  • निजी न्याय: बाइबल के अनुसार, मनुष्य का एक बार मरना और उसके बाद न्याय होना निश्चित है। मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा का ईश्वर से मिलन या अलगाव तय हो जाता है।

  • मसीह में पुनरुत्थान: ईसाई धर्म का मूल आधार यह है कि ईसा मसीह मृत्यु पर विजयी हुए। जो उन पर विश्वास करते हैं, वे मृत्यु के बाद स्वर्ग में ईश्वर के साथ 'शाश्वत जीवन' बिताएंगे।

  • अंतिम न्याय (The Last Judgment): बाइबल 'प्रकाशितवाक्य' (Revelation) की पुस्तक में बताती है कि अंत समय में मसीह दोबारा आएंगे और जीवितों व मृतकों का न्याय करेंगे।

  • स्वर्ग और नर्क: स्वर्ग वह स्थान है जहाँ कोई दुख या आंसू नहीं है, जबकि नर्क ईश्वर से पूर्ण अलगाव का स्थान है। यहाँ 'पुनर्जन्म' की कोई अवधारणा नहीं है; जीवन केवल एक बार मिलता है।


निष्कर्ष: क्या है समानता?

हालांकि इन तीनों धर्मों के मार्ग अलग-अलग हैं, लेकिन कुछ बातें सबमें समान हैं:

  1. जवाबदेही: हमारे आज के कर्म हमारे कल (मृत्यु के बाद) को प्रभावित करते हैं।

  2. नैतिकता: तीनों धर्म सच्चाई, सेवा और करुणा पर जोर देते हैं।

  3. उम्मीद: मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत या वास्तविकता का द्वार है।

चाहे वह मोक्ष की चाह हो, जन्नत की तलाश या मसीह के साथ अनंत जीवन की आशा—सफर का मकसद इंसान को इस जीवन में बेहतर बनाना है।

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