*धार्मिक कट्टरता और धार्मिक-आतंकवाद का जन्म कैसे हुआ ?*

धार्मिक आतंकवाद का जन्म !

धार्मिक कट्टरता और धार्मिक-आतंकवाद का जन्म कैसे हुआ ?

यह दुनियां बड़ी ही तीव्र गति से आतंक का शिकार हो रही है। शायद ही कोई ऐसा देश हो जिस पर आतंक का कुप्रभाव न पड़ा हो। हरेक देश दशकों से आतंकवाद के खात्में पर विचार करते आयें हैं। परंतु अब समय आ गया है जब संपूर्ण विश्व-सभ्यताओं को आतंकवाद के जड़ को समाप्त करना होगा।  हम सभी यह जानते हैं कि धार्मिक आतंकवाद की जड़ में तंगदिली व तंगख्याल्ती धार्मिक विचार होते हैं जो अपने से अलग किसी भी धार्मिक पंथ या विचार को स्वीकार नहीं करते। उनके धार्मिक विचारों (धार्मिक कट्टरता) की तंगख्याल्ती यहां तक प्रबल होती है कि वे अपने धार्मिक विचारों में इस कदर कट्टर होते हैं कि उसमें जरा-सी भी ढील देने की गुंजाइश नहीं होती।

  धार्मिक आतंकवाद जिसे जिहाद कहा जाता है यह वास्तव में किसी पद-मान-प्रतिष्ठा, संपत्ति, भूसंपत्ति, देश या किसी सामाजिक अधिकारों को पाने की गोरिल्ला लड़ाई नहीं है बल्कि यह लड़ाई है कट्टर, अहिश्नुक धार्मिक विचारों की सामान्य धार्मिक विचारों से और उनकी बनाई हुई सभ्यताओं से।

  अपने अब तक के अध्ययनों में विद्वानों ने पाया है कि सार्वभौमिक स्तर पर धार्मिक आतंकवाद केवल और केवल मुस्लिम-धर्म की देन है। अब ऐसा क्यों है इस पर हम गौर फरमायेंगे.....................

धार्मिक कट्टरता और जिहाद की पैदाईश !

   विश्व-सभ्यताओं में अनगिनत धर्म हैं। परंतु यहुदी और मुस्लिम धर्म को छोड़ ऐसा कोई धर्म नहीं जो अपने विचारों में कट्टर तंग्ख्याल्ती और जिहादी प्रकृति का हो। (लेकिन ईसाइत ने भी इनका अनुसरण किया है) ये अपने धर्म से अलग धार्मिक विचारों से *जलन रखते हैं और उन्हें किसी भी कीमत में बर्दाश्त नहीं करते। 

   धार्मिक कट्टरता की पैदाईश की यह कहानी मूल रूप से यहुदी धर्म से उत्त्पन्न होती है। यहुदी धर्म जो की इसाई और मुस्लिम धर्म का बाप है, केवल यही धर्म इन सब बातों का जिम्मेवार है। यहुदी धर्म के मुताबिक अब्राहिम ने *एकेश्वर को माना, किन्तु हम जानते हैं की उन्होने एकेश्वरवाद को नहीं चलाया अर्थात ऐसे किसी भी धर्म को स्थापित नहीं किया। उनके विचार केवल उन तक सीमित थे और यदि वे अपने विचारों का प्रचार भी करते थे तो बड़ी ही नम्रता और सहिष्णुभाव से करते थे।  

   परंतु यहुदी धर्म पुस्तकों में हम आगे देखते हैं कि मूसा नाम के एक व्यक्ति को एक पहाड़ पर (सीनै-पर्वत) *यहोवा नाम के एक *Holy Ghost  ने दर्शन दिया, जिसे बाईबल में यहोवा कहा गया। किन्तु यहोवा के लिये  Holy Ghost  एक अच्छा उच्चारण है। परंतु इसमें Holy शब्द को जोड़े रखना निसन्देह एक आपत्तिजनक बात है ! क्योंकि इस जीव (यहोवा) ने यहुदी समाज में आने के बाद बड़े ही बर्बर और अमानवीय कार्य भी किये थे, जो की कतई भी कोई भी Holy जीव ऐसा नहीं कर सकता।  यह जीव अपने चरित्र में ऐसा प्रतीत होता है मानो यह कोई तानाशाही डान हो, जो केवल अपने मानने वालों से ही प्रीति रखता हो और जो उसे और उसके विचारों को न माने उनका सत्यनाश करने का यह फरमान जारी करता है। 

धार्मिक आतंकवाद का जन्म !


  यहूदियों के ग्रंथ में अर्थात बाईबल के पुराने अहद्नामें में हम इस जीव के कई खुन्खार और पैशाचिक कार्य देखते हैं जो की यह मानवता के नाश के लिये मानवता को ही इस्तेमाल करता है। ऐसे कई उदाहरण हमें यहुदी ग्रंथों मे मिलेंगे जिनको शायद ही कोई सच्चा ईश्वर व मानव प्रेमी हृदय से स्वीकार करे।

  *धार्मिक कट्टरता का पहला उदाहरण:- अब्राहिम के बाद ही से यह तंगख्याल्ती जीव समय-समय पर उसके वंशजों से बराबर संपर्क में था। तो आगे चलकर यह जीव मूसा के सामने जलती झाड़ियों के पीछे छिप कर प्रकट हुआ (बाईबल - पुराना नियम-उत्त्पति 3:1-22.)। उसके बाद निर्गमन की पुस्तक, अध्याय 7:1-25, अध्याय 8, अध्याय 9, अध्याय 10, अध्याय 11. अध्याय 11 के आयत 7 में यहोवा (Holy Ghost) के तंगख्यालति और कत्तर विचार पढ़िए- "पर इज्राइलियों के विरुद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भोंकेगा; जिससे तुम यह जान लो कि मिश्रीयों और इज्राइलियों में मैं यहोवा अंतर करता हूँ।"  निर्गमन, अध्याय 12:29-36, 14:26-28. निर्गमन, अध्याय 19, 20, 21, 22, 23 के नियम मानवीय तो हैं परंतु इनके दंड नियम कतई भी मानवीय नहीं हैं, बल्कि पैशाचिक हैं, जो कि यहोवा ने दिये हैं !

  इसी तरह से निर्गमन अध्याय 32 कट्टरता, जिहाद और आतंक का उदाहरण है, जिसमें भी आयत 26-29 तक कट्टरता, जिहाद और आतंक का जबरदस्त उदाहरण है।

 1शमूयेल- 15:2-3, 33

 1राजाओं- 18:20-22, 40 (धार्मिक मतभेद)

 2राजाओं- 10:18-27 (बड़ी ही निर्मम और पैशाचिक हत्यायें)

  इसी रीति से यहुदी धर्म का जन्मदाता और संचालक यहोवा नाम का जो  Ghost  था उसने अपनी मंशा आज से 3400 से 3500 साल पहले ही से बाईबल की पुस्तक - निर्गमन के अध्याय 34:10-28 पर प्रकट कर दी थी। निर्गमन की पुस्तक अध्याय 32:12 में यह लिखा है-   "इसलिये सावधान रहना कि जिस देश में तू जाने वाला है उसके निवासियों से वाचा न बांधना; कहीं ऐसा न हो कि वे तेरे लिये फंदा ठहरे। 13 वरन उनकी वेदियों को गिरा देना, उनकी लाठों  को तोड़ डालना, और उनकी अशेरा नामक मूर्तियों को काट डालना; 14 क्योंकि तुम्हें किसी दूसरे को ईश्वर करके दण्डवत करने की आज्ञा नहीं, क्योंकि यहोवा जिसका नाम जलनशील है, वह जल उठने वाला परमेश्वर है।" 17 "तुम देवताओं की मूर्तियां ढालकर न बना लेना।"

  लैव्यवस्था, अध्याय 20 में यहोवा का चरित्र सदगुणी तो है, परंतु मनुष्यों में इसके उल्लंघन का दण्ड वाकई में पिशाचिये है। 

  यहोवा के तंगदिली का एक और उदाहरण- बाईबल में पुस्तक- गिनतियों 14:26-38

धार्मिक आतंकवाद का जन्म !


 व्यवस्थाविवरण 3:6 - "जैसा हम ने हेशबोन के राजा सीहोन के नगरों से किया था वैसा ही हम ने इन नगरों से भी किया अर्थात सब बसे हुये नगरों का स्त्रियों और बालबच्चों समेत सत्यानाश कर डाला।"

 व्यवस्थाविवरण 17:1-7

   इसी तरह से बाईबल के पुराने नियम की बहुत सी पुस्तकों में जो की यहुदी धर्म की पुस्तकें हैं, उनमें यहोवा ने दूसरे समाजों, समुदायों, संप्रदायों, दूसरे धर्मों के मानने वालों को उनके बालबच्चों, स्त्रियों और बूढ़ों समेत को बड़ी ही निर्ममता से मारा था और मरवाने का आदेश यहूदियों (उनके नबियों और राजाओं को) को दिया था। जिस ढ़ंग से यहोवा ने ये कत्लेआम किया था वो ढ़ंग ठीक आजकल के आतंकवादियों के समान ही तो हैं, तो इस पर आजकल के आतंकवादीयों पर आश्चर्य करना कौन सी बड़ी बात है !

  आतंक का यह नंगा तांडव आज से 3400 सालों से पश्चिम एशिया के इजराईल से चलता आ रहा है। परंतु जब आज से 2021 साल पहले इजराईल में *प्रभु येशु का और उनके विचारों का आगमन हुआ तो यहोवा ने वहाँ से (इजराईल से) प्रस्थान किया और जाकर (610 AD) अरबियों के समाज में जा मिला।

   यहोवा ने अरबी समाज में सबसे पहले मुहम्मद जी का ब्रेनवाश किया, परंतु एक अलग नाम से, जो की अरबी संस्कृति और धर्म के मुताबिक चौला पहन कर; और वह नाम हुआ- *अल्लाह !

  तो अल्लाह जो की वास्तव में यहोवा ही है ने अपनी वही पुरानी मंशा को अरबी समाज के जरिये आगे बढ़ाया। परंतु अब यहोवा के धार्मिक नियम अल्लाह रूप में कुछ अधिक ही बढ़चढ़ कर कड़े हुये। 

  अल्लाह ने शरीयत, जो कि यहोवा की वही पुरानी व्यवस्था का और अधिक कठोर रूप था प्रकट किया। इसके साथ साथ जिहाद और आतंकवाद और पैशाचिक चरित्र, क्रूरता, निर्ममता और अमानवीयता का भी फरमान जारी किया, जिसका पालन आज भी मुस्लिम समाजों में वे लोग करते हैं जो शरीयत के कुछ ज्यादा ही करीब होते हैं। क्योंकि इन्हें यह लगता है कि यही सच है और यही जीवन की सच्चाई है और यही जीवन है- रक्तपात!

 मनुष्य मनुष्य के बीच में एक *अदृश्य जीव (यहोवा अथवा अल्लाह) को लेकर और उसके विचारों को लेकर बैर, घृणा और दुश्मनी को बढ़ाना। जिस जीव को उन्होने कभी देखा नहीं और न ही कभी उससे आमने-सामने बातें ही कीं, फिर भी उसकी हर बात को केवल इसीलिये मान लिया क्योंकि उनके नबियों ने ऐसा कहा और कुछ चमत्कार कर दिखाये। 

  इसीलिये आज से 2021 साल पहले येशु ने कहा था, "कोई मेरे पिता को नहीं जानता, किसी ने उसे नहीं देखा।, "जो मुझसे पहले आये थे वे सब चोर और डाकु थे, हत्यारे थे। मुझसे बाद आने वाले भी इसी तरह के लोग होंगे।" वाकई में प्रभु येशु के ये शब्द कितने यथार्थ हैं, सचमुच आज की डेट में किसी पर भी यकिन नहीं किया जा सकता। सब के सब छलिये निकल जाते हैं, चोर, डाकु और हत्यारे ही !

धार्मिक आतंकवाद का जन्म !


आतंकवाद का सफाया

  तो इसलिये गौर फरमाने वाली बात यह है कि आतंकवाद का सफाया तब तक नहीं किया जा सकता है जब तक हम उन ग्रंथों को पढ़ना न छोड़ दें जिनके द्वारा यह जीव- (यहोवा अथवा अल्लाह) मनुष्यों के हृदयों में काबिज होकर उनकी बुद्धि को संचालित करता है। 

  हमें आतंकवाद के जड़ में कुल्हाड़ा मारने की जरुरत है, और इस जड़ को कुल्हाड़ा मार कर उखाड़ना ही हमारा काम नहीं होना चाहिये बल्कि उस जड़ को सूखा सूखा कर हमेशा के लिये जला देना ही हमारा काम होना चाहिये।

 अत: विश्व के उन प्रत्येक व्यक्ति को सावधान हो जाना चाहिये जो इन Holy Ghost (Angels) की किताबों के संपर्क में नहीं आये हैं। उन्हें चाहिये कि वे जीवन में कभी भी इन किताबों को न पढ़ें, और जबरन इनका विरोध करें। पर जिन्होने ये किताबें पढी हों वे इन किताबों को फिर से ध्यानपूर्वक पढ़ें और फिर इनकी तुलना मानवता से करें, आत्मिक बातों से करें, इंसानी भाईचारा और मानव-प्रेम से करें। ईश्वरीये प्रेम के साथ साथ मानविए प्रेम को प्राथमिकता दें; और बहुत सी बातों में अपनी मानवतावादी बुद्धि का इस्तेमाल करें। 

  ऐसे लोगों को डरने की जरुरत नहीं है, क्योंकि उस परमेश्वर से डरने की कतई भी जरुरत नहीं। परमेश्वर डर की मूरत नहीं। परमेश्वर तो प्रेम है, दयालु है, अनुग्रहकारी है, करुणामय है। वो तो मनुष्यों में आपसी प्रेम और भाईचारा चाहता है, क्योंकि हम सब उसी के बनाये हुये हैं।  यदि परमेश्वर पाप से जलन भी करता है तो न्याय करने का अधिकार उसे ही दो, हम मनुष्यों को यह अधिकार अपने हाथों में नहीं लेना चाहिये।

  वास्तविक बात तो यह है कि उस परमेश्वर को यह चिंता नहीं कि कौन उसे मानता है या नहीं मानता है, उसे तो चिंता इस बात की है कि उसके बच्चे आपस में उसके बनाये घर (इस पृथ्वी में) प्रेमपूर्वक रहते भी हैं कि नहीं।

  पर यहाँ तो सब कुछ उल्टा-पुलटा हो रहा है। सभी लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हैं, और यहां तक कहते हैं कि दूसरे का खून बहाये बिना *जन्नत नहीं है ! 

  धार्मिक आतंकवाद का सर्वनाश युद्धों, गोरिल्ला युद्धों, एयरस्ट्राइक के माध्यमों से नहीं किया जा सकता है; इसका सर्वनाश तो केवल और केवल इसकी जड़ को खत्म करके ही किया जा सकता है। अत: जब तक हम ऐसी संकुचित और अमानवीय पैशाचिक विचारधारा का समूल नाश नहीं करेंगे तब तक आतंकवाद का खात्मा असंभव है, क्योंकि आतंकवाद एक विकृत विचारधारा है !!!!

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